आपने छोटी उम्र में ही मेरी आवाज़ सुनो जैसा बड़ा सिंगिग शो जीता तो क्या उसके बाद स्कूल या परिवार में कोई स्पेशल ट्रीटमेंट मिलता था?

मेरी आवाज सुनो जीतने के बाद भी जिंदगी बिल्कुल ‘नॉर्मल’ ही थी। यहां तक कि मेरी आवाज सुनो जीतने के बाद भी मुझे स्कूल में कोई ‘स्पेशल ट्रीटमेंट’ नहीं मिला। मेरे कुछ ‘टीचर्स’ जरूर थे जो मुझे बहुत सपोर्ट करते थे, प्यार करते थे उन्होंने जरूर बहुत हौसला अफजाई की लेकिन स्कूल में ऐसा कोई ‘स्पेशल ट्रीटमेंट’ नहीं हुआ। दूसरी तरफ ये भी सच है कि मेरी आवाज सुनो में जीत के बाद मुझे बहुत ‘पॉपुलैरिटी’ मिली। उस कार्यक्रम को पूरे देश ने देखा था। उसके बाद लोगों ने मुझे बहुत प्यार दिया। दरअसल, डीडी-1 उन दिनों का सबसे बड़ा चैनल था। वही चैनल था जिसे उन दिनों पूरा देश देखा करता था। प्राइवेट चैनलों का दौर शुरू जरूर हो चुका था लेकिन डीडी-1 की लोकप्रियता ही अलग थी। तब से लेकर अब तक जो सबसे बड़ा फर्क आया वो ये कि उस वक्त वोटिंग सिस्टम नहीं हुआ करता था। वो ‘प्योर कॉम्पटीशन’ था। जहां पर ‘जजेस’ सीधे आपको ‘प्वाइंट’ देकर विजेता बनाते थे। आज इतने साल बाद भी कई बार ऐसा होता है कि मैं कहीं जाती हूं तो लोग कहते हैं वो मुझे मेरी आवाज सुनो के बाद से ही ‘फॉलो’ कर रहे हैं। उस कार्यक्रम ने मुझे पूरे देश में एक अलग पहचान दी। इसके बाद सच कहूं तो फिल्मों में गाने के लिए मेरे हिस्से का ‘स्ट्रगल’ मेरे पापा ने किया। फिल्मों में गाने से पहले वो मुझे लेकर कई लोगों से मिले। मैं तो छोटी सी थी। सिर्फ गाना गा सकती थी। पापा बाकि की सारी बातें किया करते थे।

आपको प्लेबैंक सिंगिंग में बड़ा ब्रेक कब और कैसे मिला जिसने आपके करियर की रफ्तार को बढ़ा दिया

फिर 1998 का साल आया। जब मुझे संगीतकार संदीप चौटा जी के यहां से ‘ब्रेक’ मिला। जो मेरे लिए बहुत बड़ा ‘ब्रेक’ साबित हुआ। इससे पहले भी मैं फिल्म के लिए प्लेबैक कर चुकी थी लेकिन वो गाना सिर्फ एक गाना भर था। वो गाना मैंने उदित नारायण जी के साथ गाया था लेकिन वो कोई बहुत ‘पॉपुलर’ गाना नहीं था। ‘प्लेबैक  सिंगिग’ को समझने और ‘एक्सपीरियेंस’ के लिए वो अच्छा ब्रेक था।  शायद वो फिल्म ही उतनी बड़ी नहीं थी। इसके बाद 1998 में रामगोपाल वर्मा जी और संदीप के साथ मैंने काम किया। फिल्म थी-‘मस्त’। उस वक्त इंडस्ट्री में काफी बड़े बड़े नाम थे, उनके साथ काम करना ही अपने आप में बड़ी ‘एचीवमेंट’ थी। वो भी एक नहीं बल्कि उर्मिला मातोंडकर जी के लिए मैंने तीन तीन गाने गाए। सच्चाई ये है कि वो मेरे करियर के लिए बहुत बड़ा ‘ब्रेक’  बन गया। मेरी आवाज सुनो के बाद बड़ी पहचान मुझे उस फिल्म से ही मिली। 1996 से लेकर 1998 में सच्चाई से कहूं तो प्लेबैक सिंगिग को लेकर मैंने कोई संघर्ष नहीं किया। मैं आराम से अपनी रफ्तार से चीजों को सीख रही थी। लेकिन एक बार जब 1999 में ‘मस्त’ आ गई तो मुझे लगा कि अब मेरी जिम्मेदारी बढ़ गई है। अब मेरे सामने एक खुला मैदान है, जिसमें मुझे भागना है लेकिन दिल से। मेरे ऊपर कोई ‘प्रेशर’ नहीं था कि बहुत सारे गाने गाने हैं बल्कि मन में ये आता था कि अच्छे गाने गाना है। मस्त के बाद मेरे पास अपने आप ‘ऑफर’ आने लगे। मैं ऊपरवाले का शुक्रिया देती हूं कि उस दौर में मैंने बहुत अच्छे अच्छे गाने गाए। साल 2000 में खालिद मोहम्मद की फिल्म आई फिजा। उस फिल्म में ‘महबूब मेरे’ गाना गाया, जो बहुत हिट हुआ। इसी साल विधु विनोद चोपड़ा की फिल्म आई- मिशन कश्मीर। उस फिल्म में भी मैंने ‘बूमरो बूमरो’ गाना गया, उसे भी लोगों ने काफी पसंद किया। उस दौर में और भी कुछ गाने आए जिस पर हिट का ‘स्टैंप’ लगा।फिर 1998 का साल आया। जब मुझे संगीतकार संदीप चौटा जी के यहां से ‘ब्रेक’ मिला। जो मेरे लिए बहुत बड़ा ‘ब्रेक’ साबित हुआ। इससे पहले भी मैं फिल्म के लिए प्लेबैक कर चुकी थी लेकिन वो गाना सिर्फ एक गाना भर था। वो गाना मैंने उदित नारायण जी के साथ गाया था लेकिन वो कोई बहुत ‘पॉपुलर’ गाना नहीं था। ‘प्लेबैक  सिंगिग’ को समझने और ‘एक्सपीरियेंस’ के लिए वो अच्छा ब्रेक था।  शायद वो फिल्म ही उतनी बड़ी नहीं थी। इसके बाद 1998 में रामगोपाल वर्मा जी और संदीप के साथ मैंने काम किया। फिल्म थी-‘मस्त’। उस वक्त इंडस्ट्री में काफी बड़े बड़े नाम थे, उनके साथ काम करना ही अपने आप में बड़ी ‘एचीवमेंट’ थी। वो भी एक नहीं बल्कि उर्मिला मातोंडकर जी के लिए मैंने तीन तीन गाने गाए। सच्चाई ये है कि वो मेरे करियर के लिए बहुत बड़ा ‘ब्रेक’  बन गया। मेरी आवाज सुनो के बाद बड़ी पहचान मुझे उस फिल्म से ही मिली। 1996 से लेकर 1998 में सच्चाई से कहूं तो प्लेबैक सिंगिग को लेकर मैंने कोई संघर्ष नहीं किया। मैं आराम से अपनी रफ्तार से चीजों को सीख रही थी। लेकिन एक बार जब 1999 में ‘मस्त’ आ गई तो मुझे लगा कि अब मेरी जिम्मेदारी बढ़ गई है। अब मेरे सामने एक खुला मैदान है, जिसमें मुझे भागना है लेकिन दिल से। मेरे ऊपर कोई ‘प्रेशर’ नहीं था कि बहुत सारे गाने गाने हैं बल्कि मन में ये आता था कि अच्छे गाने गाना है। मस्त के बाद मेरे पास अपने आप ‘ऑफर’ आने लगे। मैं ऊपरवाले का शुक्रिया देती हूं कि उस दौर में मैंने बहुत अच्छे अच्छे गाने गाए। साल 2000 में खालिद मोहम्मद की फिल्म आई फिजा। उस फिल्म में ‘महबूब मेरे’ गाना गाया, जो बहुत हिट हुआ। इसी साल विधु विनोद चोपड़ा की फिल्म आई- मिशन कश्मीर। उस फिल्म में भी मैंने ‘बूमरो बूमरो’ गाना गया, उसे भी लोगों ने काफी पसंद किया। उस दौर में और भी कुछ गाने आए जिस पर हिट का ‘स्टैंप’ लगा।

शुरुआत में आपकी इमेज ऐसी बनी थी कि आप सिर्फ आइट्म सॉन्ग्स ही गा सकती हैं लेकिन फिर रोमांंटिक गाने गाने का मौका आपको कैसे मिला ?

इसके बाद वो दौर भी आया जब लोगों को लगने लगा कि मैं सिर्फ ‘फास्ट’ गाने गा सकती हूं। उन गानों को ‘आइटम सॉन्ग’  कहा जाने लगा। मुझे अभी तक नहीं समझ आता कि ‘आइटम सॉन्ग’ का मतलब क्या है।  कुछ गाने होते हैं जिनको सुनकर आपको डांस करने का मन करता है, क्या उन गानों को ‘आइटम सॉन्ग’ कहा जाना चाहिए। ‘मेलोडियस’ गाने होते हैं, ‘रोमांटिक’ गाने होते हैं लेकिन ‘आइटम सॉन्ग’ क्या होते है मुझे नहीं पता। मेरे हिसाब से ये ‘टर्म’ ही गलत है। खैर,  अनु मलिक जी को लगता था कि मैं रोमांटिक गाने भी गा सकती हूं। लिहाजा उन्होंने मेरे करियर का पहला रोमांटिक गाना मुझे दिया। फिल्म थी-अजनबी। हालांकि उस फिल्म में मैं गाऊंगी, इसे लेकर अनु मलिक जी को प्रोड्यूसर से काफी संघर्ष करना पड़ा। वो मानने को तैयार ही नहीं थे कि रोमांटिक गाना गा सकती हूं। हालांकि बाद में मैंने वो गाना गाया और उसके बाद लोगों को समझ आया कि मैं रोमांटिक गाने भी गा सकती हूं। इसके बाद से ही मुझे इंडस्ट्री में हर तरह के गाने मिलना शुरू हो गए। मैं खुद को खुशनसीब भी मानती हूं कि मुझे हर तरह के गानों को गाने का मौका मिला। ये वो समय था जब मेरा मन करता था कि मैं संगीत को पारंपरिक तरीके से सीखूं लेकिन वक्त ही नहीं मिलता था। लगातार रिकॉर्डिंग्स चलती रहती थीं। यहां तक कि मैं स्कूल से छुट्टी ले लेकर रिकॉर्डिंग्स के लिए जाया करती थी। ये नौवीं क्लास की बात है। फिर एक दिन मुझे लगा कि क्यों ना मैं संगीत को और बेहतर तरीके से पढूं, मैंने मम्मी पापा से बात की। मम्मी पापा ने भी मेरे मन की बात को समझा। उन्होंने कहाकि अगर मैं चाहूं तो पढ़ाई छोड़ सकती हूं। इसके बाद मैंने पढ़ाई छोड़ दी। फिर मुझे संगीत के लिए और समय मिलने लगा। मैं टीवी पर गाने सुनती थी। रेडियो पर गाने सुनती थी। फिर वैसे ही गाने की कोशिश करती थी। कभी एकाध आलाप की ‘प्रैक्टिस’ कर ली, कभी किसी गाने की। वैसे भी मैं पढ़ाई में खराब ‘स्टूडेंट’ थी। मुझे याद है कि सातवीं क्लास तक मैं पढ़ने में बहुत अच्छी हुआ करती थी लेकिन सातवीं के बाद पढ़ाई से मेरा मन बिल्कुल ही हट गया। इम्तिहान पास होने के लाले पड़े रहते थे। मार्कशीट पर पास होने भर के नंबर नहीं आते थे।

Leave a Reply