मशहूर संगीतकार मदन मोहन अपने फिल्मी संगीत में सितार का इस्तेमाल जमकर किया करते थे। उन्हें हिंदी फिल्मों में ग़ज़लनुमा गीतों को कंपोज करने का श्रेय दिया भी जाता है लेकिन एक रोज कुछ ऐसा हुआ जिसके बाद मदन मोहन ने अपने गानों में सितार का इस्तेमाल करना बिल्कुल ही बंद कर दिया। क्या है ये पूरा किस्सा? कौन थे वो फनकार जो मदन मोहन के गानों में सितार बजाया करते थे? हम बताते हैं आपको। पहले आपको एक कभी ना भूलने वाले नगमे की याद दिलाते हैं। वो गाना था-‘नैनो में बदरा छाए’, जो 1966 में आई फिल्म मेरा साया का है जो राग भीमपलासी में कंपोज किया गया था। संगीतकार मदन मोहन ही थे। दूसरा गाना ‘आज सोचा तो आंसू भर आए’ भी मदन मोहन साहब का ही कंपोज किया हुआ था। फिल्म ‘हंसते जख्म’ के इस गाने में भी सितार का अद्भुत प्रयोग हुआ था। इस गाने को राग शिवरंजनी में तैयार किया गया था। अब आपको राग शिवरंजनी की कहानी सुनाते हैं। हुआ यूं कि सितार के मशहूर फनकार उस्ताद रईस खान और मदन मोहन पड़ोसी थे। मदन मोहन उन दिनों जिस किस्म का संगीत तैयार कर रहे थे उसे ग़ज़लनुमा गीत के तौर पर देखा जाता था। उसी दौर में मदन मोहन और रईस खान की जोड़ी बनी। इस जोड़ी में एक और नाम लता मंगेशकर का था। मदन मोहन एक के बाद एक लोकप्रिय धुने बनाते गए। इन धुनों पर उस्ताद रईस खान का सितार और लता जी की आवाज का जादू श्रोताओं के दिलोदिमाग पर छाता चला गया। एक रोज किसी बात पर मदन मोहन और उस्ताद रईस खान के बीच कहासुनी हो गई। बात इतनी बढ़ गई कि दोनों ने साथ काम ना करने का फैसला किया। इतने सालों का संबंध टूट गया। एक सुपरहिट जोड़ी टूट गई। मदन मोहन इस बात से इतने दुखी हो गए कि उन्होंने इस मनमुटाव के बाद अपने गानों में सितार का इस्तेमाल करना ही बंद कर दिया। भूलिएगा नहीं हमने इस कहानी की शुरूआत में आपको बताया था कि ‘आज सोचा तो आंसू भर आए’ राग शिवरंजनी में कंपोज किया गया था।

लगे हाथ उस्ताद रईस खान के बारे में भी आपको बता दें। उस्ताद रईस खान ऐसे कलाकार थे जिनकी उंगलियां जब सितार के तारों को छेड़ती थीं तो मालूम होता था कि सितार गाने लगा है। उस्ताद रईस खान का जन्म 1939 को इंदौर में हुआ था। वो मेवाती घराने से थे। हद्दू हस्सू और नत्थू खान जैसे महान कलाकारों के परिवार में पैदा हुए उस्ताद रईस खान ने अपने पिता से संगीत सीखा था। उन्होंने करीब 30 साल तक भारतीय सिनेमा संगीत में काम किया। 80 के दशक में वो पाकिस्तान जाकर बस गए थे क्योंकि उन्होंने वहां की नामचीन गायिका बिलकिस खानम से निकाह किया था। उन्होंने 6 मई 2017 को दुनिया को अलविदा कहा। किस्सों से किस्से निकलते हैं। एक किस्सा ये भी याद आ रहा है कि अपने निधन से कुछ ही समय पहले उन्होंने कोक स्टूडियो में एक रिकॉर्डिंग की थी, जिसमें उन्होंने राग हंसध्वनि बजाई थी।

खैर हम लौटते हैं राग शिवरंजनी पर। शिवरंजनी दर्द का राग है, वियोग का राग है। इस राग के मूल भाव में ‘पैथॉस’ है। शिवरंजनी के सुर छेड़ते ही उदासी, टीस और कसक जैसी मन:स्थितियां साकार होने लगती हैं। हालांकि  राग शिवरंजनी का कमाल ये है कि इस राग में कंपोज किया गया पचास साल से भी ज्यादा पुराना गाना आज भी शादी ब्याह के मौके पर जरूर बजता है। ये गाना 1966 में आई फिल्म सूरज का है जिसे मोहम्मद रफी ने गाया था, बोल हसरत जयपुरी के थे और संगीतकार थे शंकर जयकिशन। दिलचस्प बात ये है कि इस गाने के लिए सर्वश्रेष्ठ गीतकार, सर्वश्रेष्ठ गायक और सर्वश्रेष्ठ संगीतकार का फिल्मफेयर अवॉर्ड भी मिला था। अगर आप अब भी इस गाने का अंदाजा नहीं लगा पाए तो हम बताते हैं। इस गाने के बोल थे- बहारों फूल बरसाओ मेरा महबूब आया है। राग शिवरंजनी में कंपोज किए गए फिल्मी गानों में एक से बढ़कर एक गाने हैं। मेरे नैना सावन भादो (फिल्म- महबूबा), ओ मेरे सनम, ओ मेरे सनम (फिल्म- संगम), कहीं दीप जले कहीं दिल (फिल्म-बीस साल बाद), जाने कहां गए वो दिन (फिल्म- मेरा नाम जोकर) दिल के झरोखे में तुझको बिठाकर (फिल्म ब्रह्मचारी) आवाज देकर हमें तुम बुलाओ (फिल्म-प्रोफेसर) जैसे गाने खूब लोकप्रिय हुए। राग शिवरंजनी में ही कंपोज किया गया था फिल्म एक दूजे के लिए का सुपरहिट गाना- तेरे मेरे बीच में। एक दिलचस्प कहानी ये है कि एसपी बालासुब्रमनियम का ये पहला हिंदी गाना था जिसे लेकर फिल्म यूनिट के तमाम लोग बहुत परेशान थे कि एक दक्षिण भारतीय गायक हिंदी फिल्म का गाना कैसे गाएगा, गीतकार आनंद बक्षी ने भी बड़ी मौजमस्ती के साथ गीत के बोल लिखे थे। इस गाने के लिए उन्हें फिल्मफेयर अवॉर्ड से भी नवाजा गया था।

अब आपको राग शिवरंजनी के शास्त्रीय पक्ष के बारे में बताते हैं। इस राग में मध्यम और निषाद यानि ‘म’ और ‘नी’ नहीं लगता है। कोमल गंधार और बाकि सभी सुर शुद्ध लगते हैं। इस राग की जाति औढव-औढव है और थाट काफी। इसे मध्य रात्रि में गाया बजाया जाता है। राग शिवरंजनी राग भूपाली से काफी मिलता जुलता राग है। राग भूपाली और राग शिवरंजनी में फर्क सिर्फ गंधार का है। राग भूपाली में शुद्ध गंधार लगता है जबकि शिवरंजनी में कोमल। राग शिवरंजनी का आरोह अवरोह देख लेते हैं

आरोहसा रे प ध स

अवरोहस ध प रे से

हम आपको पहले भी बता चुके हैं कि एक सप्तक में पारंपरिक तौर पर सात सुर होते हैं। इससे आगे अगर थोड़ी सी और बारीक जानकारी आपको दी जाए तो दरअसल एक सप्तक में दरअसल बारह सुर होते हैं। इसको और आसानी से इस तरह समझिए कि अगर हम हारमोनियम पर शुद्ध ‘स’ ‘रे’ ‘ग’ ‘म’ ‘प’ ‘ध’ ‘नी’ बजा रहे हैं तो दरअसल शुद्द ‘स’ और ‘रे’ के बीच में एक और सुर होता है जिसको हम छोड़ देते हैं। उसे कहते हैं कोमल ‘रे’। ऐसे ही कोमल ‘ग’ छोड़ते हैं। ऐसे ही एक सप्तक में हम जितने सुरों को छोड़ते जाते हैं अगर उन्हें भी जोड़ लिया जाए तो एक सप्तक में बारह सुर हो जाएंगे। इसमें से सात

सुर शुद्ध होते हैं और पांच विकृत। विकृत सुर भी दो तरह के होते हैं- कोमल और तीव्र। ‘रे’ ‘ग’ ‘ध’ ‘नी’ कोमल विकृत हो सकते हैं। विकृत को थोड़ा आसान करके इस तरह भी समझा जा सकता है कि शुद्ध से ठीक पहले वाला सुर कोमल सुर होता है। बस ध्यान रखने वाली बात ये है कि कोमल ‘म’ नहीं होता। ‘म’ और ‘प’ के बीच जो सुर छूटता है वो तीव्र ‘म’ कहलाता है। सप्तक में अचल सुर ‘स’ और ‘प’ होते हैं। कोमल सुरों के नीचे ‘हाइफन’ लगाते हैं और तीव्र के ऊपर एक बिंदु लगा देते हैं। ‘आज जाने की ज़िद ना करो’ गजल से पूरी दुनिया में मशहूर पाकिस्तान की गायिका फरीदा खानम ने भी राग शिवरंजनी को अपनी बैठकों में खूब गाया है। उनकी एक और ग़ज़ल बड़ी मशहूर है जिसके बोल हैं- राह आसान हो गई, जान पहचान हो गई।

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