राग ललित की कहानी दो महान शायरों की कलम के जादू के बहाने से करेंगे। पहले शायर हैं शकील बदायूंनी और दूसरे साहिर लुधियानवी। दोनों एक दूसरे के लगभग समकालीन। शकील बदायूंनी का जन्म 1916 में हुआ था और साहिर का जन्म 1921 में, बदकिस्मती देखिए कि शकील 53 साल की उम्र में दुनिया छोड़ गए और साहिर सिर्फ 59 साल की उम्र में। अदब की दुनिया से अलग दोनों ने फिल्मी दुनिया को एक से बढ़कर एक नगमे दिए हैं। दोनों के मिजाज के सैकड़ों किस्से आज भी सुने और सुनाए जाते हैं। दोनों के दोनों संगीतकार नौशाद के पसंदीदा शायर थे। असलियत ये कि वो एक दौर था जब नौशाद, साहिर और शकील फिल्म इंडस्ट्री पर राज कर रहे थे। जो भी लिखा जाता, जो भी कंपोज होता वो हिट होता। ऐसे ही दौर में इन दोनों की कलम आपस में टकरा गई। उसे वक्त की मांग कहें, संगीतकार की जरूरत कहें या फिर सोच का फर्क, लेकिन सदियों तक सुनाया जाने वाला किस्सा तो बन गया। इस किस्से को बयान करने से पहले इन दोनों शायरों की कलम का जादू देख लेते हैं। ध्यान में सिर्फ इतना रखिएगा कि दोनों ताजमहल के बारे में लिख रहे हैं। शकील बदायूंनी ने लिखा-

इक शहंशाह ने बनवा के हसीं ताजमहल

सारी दुनिया को मुहब्बत की निशानी दी है

इसके साये मे सदा प्यार के चर्चे होंगे

खत्म जो हो ना सकेगी, वो कहानी दी है

 

एक शहंशाह ने बनवा के…

दूसरी तरफ साहिर लुधियानवी लिखते हैं, साहिर की कलम में आपको क्रांति का एक ‘टच’ मिलेगा-

 

ताज तेरे लिए इक मजहर-ए-उल्फत ही सही

तुम को इस वादी-ए-रंगीं से अकीदत ही सही

मेरे महबूब कहीं और मिला कर मुझसे…

ये चमनजार, ये जमुना का किनारा, ये महल

ये मुनक्कश दर-ओ-दीवार, ये महराब, ये ताक

इक शहंशाह ने दौलत का सहारा ले कर

हम गरीबों की मुहब्बत का उड़ाया है मजाक

कलम के इस जादू और सोच के इस फर्क के पीछे का किस्सा बड़ा दिलचस्प है। जिसके लिए साल 1964 में जाना होगा। साल 1964 में दो फिल्में आईं- लीडर और ग़ज़ल। लीडर को निर्देशक राम मुखर्जी बना रहे थे और ग़ज़ल को वेद मदन। लीडर में संगीत नौशाद का था और ग़ज़ल में मदन मोहन का। कहा जाता है कि फिल्म लीडर के लिए नौशाद साहिर से एक गीत ताजमहल पर लिखवाना चाहते थे। साहिर क्रांतिकारी सोच वाले थे। उन्होंने लिखा कि इक शहंशाह ने दौलत का सहारा ले कर, हम गरीबों की मुहब्बत का उड़ाया है मजाक। गीत के ये बोल फिल्म के मिजाज से मेल नहीं खा रहे इसलिए नौशाद ने शकील बदायूंनी से इसी गीत को लिखवाया। शकील ने लिखा- इक शहंशाह ने बनवा के हसीं ताजमहल सारी दुनिया को मुहब्बत की निशानी दी है।

ये भी दिलचस्प है कि इन रचनाओं को उस दौरे के दो बड़े कलाकार दिलीप कुमार और सुनील दत्त पर फिल्माया गया था। कलम की इस तकरार से बाहर निकलकर अपनी राग की कहानी पर वापस लौटते हैं। संगीतकार नौशाद फिल्म लीडर के लिए जिस तरह के गीत की तलाश कर रहे थे वो उनके लिए शकील बदायूंनी ने लिखा था। इस फिल्म के लिए नौशाद ने एक से बढ़कर एक गाने तैयार किए थे। अपनी आजादी को हम हरगिज मिटा सकते नहीं, मुझे दुनिया वालों शराबी ना समझो, तेरे हुस्न की क्या तारीफ करूं, ऐसे में नौशाद को ताजमहल वाले गाने के लिए कुछ अलग ही रचना था। उन्होंने इस गीत को शास्त्रीय राग ललित को आधार बनाकर कंपोज किया। जो गाना आज पचास साल बीत जाने के बाद भी सुना जाता है। राग ललित के आधार पर हिंदी फिल्मों में कम ही गाने बने हैं। साल 1959 में आई फिल्म- चाचा जिंदाबाद का गाना प्रीतम दरस दिखाओ, साल 1960 में आई फिल्म- कल्पना का गाना- तू है मेरा प्रेम देवता और साल 2010 में विशाल भारद्वाज की फिल्म-इश्किया का गाना बड़ी धीरे जली रैना भी राग ललित पर ही आधारित है।

आइए अब आपको राग ललित के शास्त्रीय पक्ष के बारे में बताते हैं। राग ललित की उत्पत्ति मारवा थाट से है। इस राग में दो मध्यम और ‘रे’ कोमल लगता है। इस राग में ‘प’ नहीं लगता है। इस राग की जाति षौढ़व षौढ़व है। इस राग का वादी स्वर शुद्ध ‘म’ और संवादी स्वर ‘स’ है। इस राग को गाने बजाने का समय रात का आखिरी प्रहर होता है। आइए अब आपको राग ललित का आरोह अवरोह और पकड़ बताते हैं।

आरोह- नी रे ग म म (तीव्र) म ग, म (तीव्र) ध नी ध सां

अवरोह- रे नी ध, म (तीव्र) ध म (तीव्र) म ग, म (तीव्र) ग रे सा

पकड़- नी रे ग म, म (तीव्र) म ग, ध म (तीव्र) ध म (तीव्र) म ग

फिल्मी संगीत से इतर कुछ सुगम संगीत में ही राग ललित के लक्षण मिलते हैं। विश्वविख्यात गज़ल गायक जगजीत सिंह की गाई एक ग़ज़ल इस संदर्भ में उल्लेखनीय है। बोल हैं कोई पास आया सवेरे सवेरे और कलाम सईद राही का है। इसके अलावा एक और दुर्लभ वीडियो है, जो जगजीत सिंह, पंडित हरि प्रसाद चौरसिया और उस्ताद जाकिर हुसैन की जुगलबंदी का है। ग़ज़ल वही है लेकिन तीन दिग्गज कलाकारों की जुगलबंदी का अनोखा रंग आपको इस वीडियो में देखने को मिलेगा।

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