ऐ मोहब्बत तेरे अंजाम पे रोना आया

जाने क्यों आज तेरे नाम पे रोना आया

सुर और लफ्ज़ों की एक अलहदा दुनिया में ले जाती हैं बेग़म. खालिस रागदारी से सजी गायकी. ताल में रहते हुए भी ताल को बोलों से आज़ाद रहकर गाना, जैसे ख़याल की बढ़त कर रही हों. ग़ज़ल के अल्फ़ाज़ के साथ छोटे-छोटे आलाप का सफ़र और फिर सम पर यूं आना कि- भूल गए? यहीं से तो चले थे. एक तो ग़ज़ल की बेजोड़ आदायगी और दूसरा- पोएट्री का बेहतरीन सलेक्शन. बेगम ग़ज़लों को बहुत एहतियात के साथ चुनती थीं. जो शायरी ख़ुद उनके भीतर तक उतर जाए, उसी को कंपोज़ करती और गाती थीं ताकि शायर के दिल की बात सुननेवालों के दिल तक पहुंच सके.

किसी इंटरव्यू में बेग़म अख़्तर ने कहा भी था “ ठुमरी और ग़ज़ल का गाना ऐसा आसान नहीं है जैसा अमूमन समझ लिया जाता है, ख़ासतौर से ग़ज़ल. हमारी मौसीक़ी में ग़ज़ल का एक अपना ही मक़ाम है. इसकी अदायगी में कई पहलुओं को मद्देनज़र रखना पड़ता है, ग़ज़ल शायर के दिल की आवाज़ है, हुस्न और इश्क का एक खूबसूरत मुनक्क़द (संयोजन) है, अगर कोई ग़ज़ल गानेवाला अपनी अदायगी से इस हुस्न-ओ-इश्क़ के पैग़ाम को सामयीन के दिल तक पहुंचा सके तब और सिर्फ तभी उसे ग़ज़ल गाने का हक़ मिलता है ”

ग़ज़ल को लेकर बेग़म अख़्तर की इसी संजीदगी का असर था कि उन्हें मल्लिका-ए-ग़ज़ल कहा गया. उनके बारे में उर्दू के अज़ीम शायर कैफ़ी आज़मी ने कहा- ”ग़ज़ल के दो मायने होते हैं, पहला ग़ज़ल और दूसरा बेग़म अख़्तर.”

लखनऊ से अस्सी मील दूर फैजाबाद में पैदा हुई थीं अख्तरी बाई. इसलिए अख्तरी बाई फैजाबादी नाम से भी जानी जाती थीं. बचपन का नाम था बिब्बी. नवाबों का दौर से ही फैजाबाद के माहौल में संगीत रचा बसा था. नवाब वाजिद अली शाह दादरा ठुमरी गाने के लिए जाने जाते थे. बिब्बी मुश्किल से सात साल की थीं तभी से नाटकों का संगीत उन्हें लुभाने लगा था. नाटकों से जुड़ी भीं लेकिन घर से बढ़ावा नहीं मिला. उनकी असल तालीम हुई क्लासिकी मौसीकी में. बड़ों के कहने पर पटना के मशहूर सारंगी वादक उस्ताद उस्ताद इमदाद खान से गायकी सीखना शुरू किया. दस-ग्यारह साल की हुईं तो मां के साथ कलकत्ते चली गईं. वहां पटियाला घराने के उस्ताद अता मोहम्मद खान साहब से तालीम शुरू हुई. अता मोहम्मद खान बड़े सख्त उस्ताद थे. बेग़म बताती हैं- सुबह का रियाज़ भैरव और शाम का यमन में होता था. जाड़े के दिनों में भी तीन बजे रात को उठाते थे. दस-ग्यारह बरस की बिब्बी आंखें बंद किए उठकर बैठती थीं, तानपुरा मिला हुआ सामने रखा होता था. हालत ये हो गई थी कि सो रही हैं, उस्ताद की आवाज़ कान में पड़ी तो तकिये से सिर उठाकर आss आss करते हुए उठती थीं. रियाज़ में कमी होती थी तो उस्ताद बहुत नाराज़ भी हो जाते थे. उसी कठिन रियाज़ ने अख्तरी बाई के सुरों में वो जादू पैदा किया सुननेवाले वाह वाह कर उठते थे.

अख्तरी बाई ने कलकत्ते में मोहम्मद खान, अब्दुल वहीद खान और उस्ताद झंडे खान से भी गाना सीखा. किराना घराने के उस्ताद अब्दुल वहीद खान बहुत बड़ी शख्सियत थे. ये वो दौर था जब ठुमरी दादरा गाना बड़े गायक अपने शान के खिलाफ समझते थे. अब्दुल वहीद खां साहब खुद ठुमरी नहीं गाते थे लेकिन शिष्यों को बताते जरूर थे. उन्होने अख्तरी बाई को भी खयाल, ठुमरी, दादरे की गायकी का फर्क समझाया.

1934 की बात है. बिहार में जबर्दस्त भूकंप आया था. भूकंप पीड़ितों की मदद के लिए एक कार्यक्रम रखा गया जिसमें 15 साल की अख्तरी बाई गाने पहुंचीं. सुननेवालों में भारत कोकिला सरोजनी नायडू भी थीं. उन्होने अख्तरी बाई के गाने को खूब सराहा, इससे हौसला बढ़ा तो रिकॉर्डिंग्स का सिलसिला शुरू हुआ. अख्तरी बाई की आवाज़ में ठुमरी, दादरा और ग़ज़लों के रिकॉर्ड बाजार में आने लगे. शोहरत के साथ फिल्मों के भी ऑफर आए. अख्तरी बाई ने ‘एक दिन का बादशाह’ और ‘नल दमयंती’ में अभिनय भी किया. लेकिन 1942 में आई फिल्म रोटी काफी चर्चित हुई. अख्तरी बाई के अभिनय से ज्यादा उनकी गाई छह ग़ज़लों के लिए. इस फिल्म में संगीत दिया था मशहूर संगीतकार अनिल बिस्वास ने.

सत्यजीत रे की फिल्म जलसाघर में भी अख्तरी बाई नजर आई थीं. जलसाघर में उनकी गाई राग पीलू में ये ठुमरी सुनिए

अख्तरी बाई की नजर में शादी की बहुत अहमियत थी. 1945 में वो लखनऊ लौटीं और उस जमाने के एक नामी वकील इश्तियाक अहमद अब्बासी से शादी कर ली. इस तरह अख्तरी बाई बेगम अख्तर हो गईं. घर में ऊपरवाले का दिया सब कुछ था, लेकिन अब्बासी साहब को बेगम का गाना गाना पसंद नहीं था. शादी निभाने के दबाव में करीब पांच साल तक बेगम गाने से दूर रहीं, पानी बिन मछली की तरह तड़पती रहीं. गाने से दूर रहकर जैसे जिंदगी का मतलब खत्म हो गया था. वो गुमसुम सी रहने लगीं, बीमार रहने लगीं.

मौसीकी का पंछी कैद में नहीं रह सकता, उसे उड़ने के लिए खुला आसमान चाहिए. बेग़म जानती थीं कि उन्हें लाखों-करोड़ों लोगों के दिलों तक पहुंचना है, उन्हें गाना है, उन्हें गाना ही होगा.  आखिरकार अब्बासी साहब को समझ में आया कि गायकी में बेगम अख्तर की जान बसती है, उन्हें गाने से दूर रखना ठीक नहीं. 1949 बेगम फिर सुरों की दुनिया में लौटीं. ऑल इंडिया रेडियो के लखनऊ स्टूडियो में उन्होने तीन ग़ज़लें और एक ठुमरी रिकॉर्ड की. इसके बाद संगीत का सफर जो दोबारा शुरू हुआ तो बस चलता ही चला गया.

बेगम अख्तर की ठुमरी में पंजाबी अंग साफ झलकता था. बेगम खुद कहती हैं कि पटियाला घराने के उस्ताद बरकत अली खान का गायकी सुनकर उन्होने बहुत सीखा

ग़ज़ल को बेग़म ने बेपनाह शिद्दत के साथ चाहा, साधा और पेश किया. ग़ज़ल गायकी का उनका अंदाज़ इतना डूबा हुआ था कि उन्हें सुनते हुए लगता है कि मानो ग़ज़ल खुद सामने खड़ी हो गई हो. शास्त्रीय संगीत में ट्रेनिंग की वजह से तीनों सप्तकों में उनकी आवाज़ पानी की तरह तैरती थी.

बेगम की गाई ये ठुमरी भी बेहद लोकप्रिय है-

ओ री कोयल बावरी, तू क्यूं मल्हार गाए है

छा रही काली घटा, जिया मोरा लहराए है

मेवाती घराने के धुरंधर गायक पंडित जसराज तो बेग़म अख़्तर के दीवाने थे. वो कहते हैं कि स्कूल जाते वक्त रास्ते में कहीं बेग़म की वो ग़ज़ल बजती थी-

दीवाना बनाना है तो दीवाना बना दे, वर्ना कहीं तकदीर तमाशा न बना दे

जसराज सबकुछ भूलकर वहीं बैठ जाया करते थे. जसराज जी तो यहां तक कहते हैं कि गायक बनने की प्रेरणा भी उन्हें बहुत हद तक बेग़म अख़्तर से मिली

अनगिनत शायरों की बेहतरीन ग़ज़लों में अपनी आवाज़ भरकर उन्हें ज़िंदा करने के बाद 30 अक्टूबर, 1974 को बेग़म इस फ़ानी दुनिया से रुख़सत हो गईं, लेकिन आज भी उनकी गाए नग़में करोड़ों लोगों की ज़िंदगी में सुकून भर रहे हैं.

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