क्या आपको पहली बार स्टेज पर परफोर्म करते हुए डर लगा था या फिर आपके गुरुजनों से आपको इस बारे में भी ट्रेनिंग मिली थी?

मेरे गुरू रामाश्रय झा जी कभी कभी हम लोगों को कोई कलाकार बाहर से आता था तो उसके पीछे तानपुरे पर बिठा देते थे। उस कलाकार को बोल भी देते थे कि थोड़ी आवाज इन लोगों से भी लगवा लीजिएगा। वो भी ट्रेनिंग का एक तरीका ही होता है। उस वक्त तक हमें पता भी नहीं होता था कि बंदिश कौन सी है, राग कौन सा है, बस गुरू जी बिठा देते थे। फिर कभी कभी ऐसा भी होने लगा था कि अपने ही किसी शिष्य के साथ तैयार कराके वो ‘ड्यूअट’ गवा देते थे। मंच पर आने का सलीका, क्या गाना चाहिए, कैसे जाना चाहिए सब कुछ उन्होंने सीखाया। कई बार तो गुरू जी स्वयं हारमोनियम पर संगत करते थे। फिर एक वर्ष ऐसा हुआ कि जो उत्तर प्रदेश संगीत नाटक अकादेमी है उसकी एक स्पर्धा होती थी, जिसमें नृत्य और गायन में अलग अलग वर्ग के ‘स्टूडेंट्स’ जाते थे। एक वर्ष मैंने कथक  नृत्य में वो स्पर्धा जीती और अगले वर्ष गायन में वो स्पर्धा जीती। ये सब पंडित जी की तालीम से ही संभव हुआ था क्योंकि उनसे पहले तो मुझे विधिवत तालीम नहीं मिली थी जो भी थोड़ा बहुत सीखा था कमला दीदी के पास जाकर सीखा था। मुझे सुनने का शौक जरूर था, लेकिन मैं कच्ची मिट्टी ही थी जिसको गुरू जी ने कुछ बनाकर मंच पर पेश कर दिया। संगीत के क्षेत्र में इजाजत के बिना कुछ नहीं होता। एक रोज पंडित रामाश्रय झा जी ने ही तय किया अब तुम थोड़ा थोड़ा अकेले भी गाया करो।

इलाहाबाद के बाद आपने पहला कार्यक्रम कहां किया, उससे जुड़ा कोई किस्सा भी है क्या?

साल 1980-81 की बात है। मुंबई में एक कार्यक्रम हुआ करता था- सुर श्रृंगार संसद। उस कार्यक्रम में सुरमणि आदी की उपाधि दी जाती है। वो कार्यक्रम अब भी वहां होता है। एक रोज पंडित जी ने कहाकि चलो मुंबई तुमको गवाते हैं। मेरे साथ मां भी गईं और गुरू जी भी। गुरूजी ने मेरे साथ हारमोनियम पर संगत की। इलाहाबाद के बाहर वो मेरा पहला कार्यक्रम था। कार्यक्रम के बाद का एक छोटा सा किस्सा है मुझे हमेशा याद रहता है। हुआ यूं कि मेरे कार्यक्रम के बाद संगीत के परम जानकार मोहन नाटकर्णी ने एक ‘रीव्यू’ लिखी थी। उस ‘रीव्यू’ में उन्होंने मेरे गायन की काफी तारीफ की थी। खूब आशीर्वाद दिया था। वो अखबार जब पिता जी के हाथ लगा तो उन्होंने उसमें से वो कतरन तो निकाल ली, लेकिन मुझे कभी नहीं दिखाया। मेरे हाथ वो कतरन अभी कुछ समय पहले ही लगी। इस बात में कोई दोराय नहीं है कि पंडित रामाश्रय झा जी के साथ होने से ही ये सब संभव हुआ था। पंडित जी ही सबकुछ तय किया करते थे। मुझे क्या गाना है। कहां गाना है। उस समय तक मैं ये सब तय नहीं करती थी कि मुझे कौन सा राग गाना है, कौन सी बंदिश गानी है। पंडित जी ही बताते थे कि पहले इससे शुरू करना, फिर फलां चीज गाना। ऐसा लगता था कि पंडित जी ऊंगली पकड़कर चलना सीखा रहे हैं। यही तरीका भी था उनका।

पंडित कुमार गंधर्व जी से पहली बार सीखने का मौका कैसे मिला?

बाद में मुझे विनय मुद्गल जी, वसंत ठकार जी, जितेंद्र अभिषेकी जी, पंडित कुमार गंधर्व जी और नैना देवी जी से भी सीखने का सौभाग्य मिला। कुमार गंधर्व जी के श्रोताओं में मेरा परिवार हमेशा से रहा है। कुमार जी जब भी इलाहाबाद आते थे तो वहां के एक प्रतिष्ठित वकील परिवार के यहां ही रूकते थे। वो लगभग हर वर्ष वहां गाते थे। हम सब उनको बड़ी भक्ति से सुनने जाते थे। मैंने कभी नहीं सोचा था कि मैं उनके निकट बैठ भी पाऊंगी। कभी उनको एक शिष्य की तरह बैठकर सुन भी पाऊंगी। वो केवल इसलिए हुआ कि जब गांधर्व महाविद्यालय से मेरा संबंध हुआ तो वहां से कुमार जी के बड़ी नजदीक संबंध थे। मैं पहली बार उनके सीखने के लिए जब देवास गई तो दो चीजें का जिक्र करूंगी। एक तो ये कि बड़े बड़े कलाकारों के परिवारों का भी धन्यवाद देना होगा, विशेषकर हमारी गुरू माता वसुंधरा कोमकली जी का। कुमार जी के यहां आए दिन लोग टूट पड़ते थे। ऐसे कलाकारों के लिए लोग बहुत ही दीवाने होते हैं। उसी में हम सब भी वहीं होते थे, सीखने-सीखाने के लिए। मैं पहली बार जब वहां गई तो वसुंधरा ताई ने जिस प्रकार से मेरा ध्यान रखा को हमेशा याद रहेगा। मेरा बेटा तब छोटा था वहां वो भी मेरे साथ था। एक ऐसे घर में जब बच्चा धमाचौकड़ी मचाने लगे तो आप सोचिए लेकिन हमेशा उन्होंने मेरा ध्यान रखा। इसीलिए उन कलाकारों के परिवारों को शत शत नमन जो शिष्य परिवारों को भी खुद में समेट लेते हैं। सह लेते हैं, या इलाहाबादी भाषा में कहूं तो झेल लेते हैं।

इलाहाबाद से आपका खास नाता है उसके बारे में कुछ बताइए

दूसरी बात जिसका जिक्र करना जरूरी है, उस वक्त कुमार जी हमें एक धूनी संस्थान लेकर गए। वहां धूनी पर एक शीशे पर कबीरदास जी का एक पद मढ़ा हुआ था। ‘उड़ जाएगा हंस अकेला’ और वहां का जो सन्नाटा था, बल्कि उसे सन्नाटा नहीं कहना चाहिए एक शांति थी वहां, एक अजब सा ठहराव था। वो उससे उनका क्या संबंध था, उनके गायन का क्या संबंध था कुछ हद तक मुझे समझ आया। कहने का मतलब ये था कि ना केवल सामने बैठ कर सिखाना बल्कि उसके मायने समझाना। कुमार जी रागदारी सीखा रहे हों, बंदिश सीखा रहें हो या कुछ और उसके अलावा ये भी बताते थे कि किस संदर्भ में कौन सी चीज कैसे कही जानी चाहिए। उसका तात्पर्य क्या है। उसकी ‘बैकग्राउंड’ जानकारी भी परोसकर दिया करते थे। ये ज्ञान बड़े बूढ़ों का ही दिया होता है। इलाहाबाद से लेकर हर जगह मेरे गुरूओं का हमेशा मुझे बहुत प्यार मिला। अब भी मिलता है। इलाहाबाद का जिक्र चला है तो मैं बताना चाहूंगी कि इलाहाबाद को बहुत मिस करती हूं। आज भी मेरे मौसा जी वहां रहते हैं। कोई भी त्योहार आता है तो वहां का मोतीचूर लड्डू, छोटे वाले समोस, कभी अमरूद कभी कुछ ना कुछ जरूर भेजते हैं। मेरे बहुत सारे प्रिय मित्र भी वहां हैं। इलाहाबाद मैं जाऊं ना जाऊं एक रिश्ता है। मेरे पति अनीश कहते हैं कि तुम लोगों का इलाहाबाद माफिया है। पूरे विश्व में कहीं भी चले जाओ तुम्हारे इलाहाबाद का कोई ना कोई ‘कनेक्शन’ मिल ही जाता है। कोई स्कंद जी का स्टूडेंट रहा है, कोई जया जी का। ऐसी बहुत सारी चीजें हैं जो सिर्फ इलाहाबाद में ही मिलती हैं। आप दिल्ली या मुंबई चले जाइए तो वैसा स्वाद नहीं मिलता। चाहे वो हीरा हलवाई की मिठाई हो या इलाहाबादी समोसे। इलाहाबाद में मूंमफली के साथ एक खास तरह का नमक मिलता था जो मैंने और कहीं कभी देखा ही नहीं।

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