अली मोरे अंगना से लेकर अबके सावन ऐसे बरसे तक कई पॉपुलर गाने गाकर कामयाबी की नई ऊंचाईयों पर पहुंच चुकी शुभा मुदगल ने रागगिरी से खास बातचीत की। इस Exclusive Interview में हमने उनसे पूछा कि क्या वो पॉपुलर म्यूज़िक गाने समय डरती हैं क्योंकि उन्होंने कई महान शास्त्रीय संगीतकारों की शिष्या रह चुकी हैं। स्टेज पर शोज़ करते समय उन्हें पॉपुलर म्यूज़िक गाने में ज्यादा मज़ा आता है या फिर शास्त्रीय संगीत गाने में। शुभा मुदगल के लिए संगीत क्या है और वो इसे और आगे तक ले जाने के लिए क्या नया कर रही हैं आइए उन्हीं से जानते हैंष

आपसे किसी ने परज सुनाने की ऐसी फरमाहिश की थी कि आप उसे आज भी याद करती हैं तो आपकी आंखें नम हो जाती हैं, ये किस्सा क्या है?

मेरे शास्त्रीय गायन के कार्यक्रमों में कुछ ऐसे कार्यक्रम हैं जो कभी भूल नहीं सकती। इसके पीछे मेरा गायन नहीं है। 90 के दशक की बात है मुझे मैहर से ‘इनवीटेशन’ आया कि मुझे वहां गाना है। मैं मुंबई में गाकर ट्रेन से मैहर पहुंची। उन दिनों फ्लाइट का जमाना नहीं था।  मैं एक रात पहले वहां पहुंची थी। हालांकि मैंने तार-चिट्ठी सब भेज दी थी कि मैं फलां ट्रेन से पहुंच रही हूं लेकिन सूचना नहीं पहुंची। आयोजकों ने सोचा कि मेरा पता तो दिल्ली का है तो मैं दिल्ली से ही आ रही हूं। रात के करीब सवा नौ बजे मैं वहां पहुंची। एक छोटा सा स्टेशन। उस ट्रेन से उस स्टेशन पर इकलौती मैं ही उतरी। स्टेशन पर सन्नाटा। वहां कोई नहीं था आयोजकों की तरफ से। उन दिनों मोबाइल का जमाना भी नहीं था। अब जाएं तो कहां जाए। मैं अकेली थी तो थोड़ा डर भी लग रहा था। देखा तो एक झाडू लगाने वाले वहां से कुछ दूरी पर घूम रहे थे। वो आए और उन्होंने नमस्कार किया। उन्होंने पूछा कि आप कार्यक्रम के लिए आई हैं। मैंने कहा-जी। उन्होंने कहा आप बिल्कुल चिंता मत कीजिए। मैं अभी स्टेशन मास्टर के कमरे में जाकर उन लोगों को खबर भेजता हूं। तब तक आप आराम से बैठिए। दस पंद्रह मिनट में कोई आ जाएगा। मुझे समझ नहीं आया कि ये सज्जन जो इतनी मदद कर रहे हैं, आतिथ्य दिखा रहे हैं मैं उसे स्वीकार करूं भी या नहीं। अब सोचती हूं तो लगता है कि हमारा दिमाग भी शहरी हो जाता है। उन्होंने स्टेशन मास्टर का कमरा खोला, मुझे वहां बिठाया। थोड़ी देर में चाय आ गई। चाय आने के कुछ ही मिनटों के भीतर आयोजकों की तरफ से भी कुछ लोग आ गए। उन लोगों ने कहा- अरे आप मुंबई से आ गईं हम लोग तो सोच रहे थे कि आप दिल्ली से आएंगी। बहरहाल जब हम लोग वहां से सामान लेकर निकलने लगे, तो वो सज्जन वहीं खड़े थे। मैंने उनके पास जाकर कहाकि मुझे समझ नहीं आ रहा है कि मैं कैसे आपका धन्यवाद दूं। मुझे ये भी नहीं समझ आ रहा था कि उन्हें चाय के पैसे दिए जाएं या नहीं। आज भी उनका जवाब याद करती हूं तो आंख भर आती है, उन्होंने कहा नहीं नहीं ऐसा कोई धन्यवाद नहीं, आप यहां आई यही बड़ी बात है। बस एक गुजारिश थी कि ‘परज’ बहुत दिनों से नहीं सुना है। वो सुना दीजिएगा कल। मैं हक्की बक्की रह गई। मैं सोचने लगी कि उस्ताद अलाउद्दीन खां साहब ने क्या काम किया होगा कि स्टेशन पर काम करने वाले का कहना है कि ‘परज’ सुना दीजिएगा।

अली मोरे अंगना गाना जो आपका इतना सुपरहिट हुआ उसे आपने किस तरह से रिकॉर्ड किया था?

शास्त्रीय गायकी का दौर यूं ही चलता रहा लेकिन मैं सड़क पर निकलूं और लोग पहचान जाएं, वो समय ‘अली मोरे अंगना’ और ‘अबकी सावन’ गाने के बाद आया। 1996 में ‘अली मोरे अंगना’ गाया और 1999 में ‘अबकी सावन’ गाया। इसमें कोई दो राय नहीं है कि इसके बाद मुझे अलग ही पहचान मिली। दिल्ली में एक स्टूडियो है जो जवाहर वाटल जी चलाते थे। उन दिनों वो बहुत काम कर रहे थे। उस समय के जो इंडी पॉप के स्टार थे। बाबा सहगल हो, दलेर मेंहदी हों, बड़े बड़े स्टार्स हों जिनके बहुत हिट एल्बम हुए। उनके स्टूडियो में मैं मल्हार की रिकॉर्डिंग कर रही थी। रिकॉर्डिंग के बीच-बीच में कभी कभार जब वो आते थे तो उनसे ‘हाय-हैलो’ हो जाती थी। एक दिन वो ‘रिकॉर्डिंग’ के दौरान आए और कहने लगे कि आज जब आपकी ‘रिकॉर्डिंग’ खत्म हो जाए तो एक कप चाय पीएं मेरे साथ। उन्होंने चाय पीते-पीते कहाकि मेरे दिमाग में एक विचार आया है कि शास्त्रीय संगीत के बेस पर कोई गीत बनाया जाए। उसमें आप तानपुर वगैरहा रखिए लेकिन मैं उसमें ‘ड्रम्स’ और ‘कीबोर्ड’ भी डालूंगा। मैंने कहाकि मैंने ऐसा कभी किया नहीं है और ये भी नहीं जानती कि मैं कर पाऊंगी या नहीं। मैंने उन्हें ये भी बताया कि ‘मल्टी ट्रैक रिकॉर्डिंग’ क्या होती है, मुझे पता तक नहीं है। मैं तो हमेशा साज संगत साथ लेकर गाती हूं। खैर, झिझकते-झिझकते ‘फाइनली’ एक रोज उन्होंने एक गाना गवाया मुझसे- अली मोरे अंगना। मुझे ‘चैलेंजिंग’ भी लगा कि गाना याद किया और झट से गा दिया। साथ में कोई नहीं बस हेडफोन से सब सुनाई दे रहा है। इस तरह से वो एल्बम तैयार हुआ।

क्या पॉपुलर म्यूज़िक के साथ शास्त्रीय संगीत मेल आपको सही लगता है?

इसके बाद मेरी गायकी से ऐसे श्रोता भी जुड़े जो शायद पहले शास्त्रीय संगीत नहीं सुनते थे। कुछ लोग ऐसे जरूर होंगे जिनको शायद ये बात पसंद ना आई हो कि मैंने ‘पॉपुलर’ गाना क्यों गाया लेकिन फिर हो सकता है कि उन्हें मेरा गाना ही पसंद ना हो,  मेरा संगीत ही पसंद ना हो। मेरे ख्याल से शास्त्रीय संगीत के जानकारों को एक चिंता ये रही होगी कि जब मैं यमन गाने बैठूंगी तो कहीं कुछ उलटा सीधा ना कर दूं। इस बात को लेकर उनकी फिक्र जायज है। मैं ऐसे लोगों को सम्मान देती हूं। उन्हें धन्यवाद देती हूं। साथ साथ मैं ये बताना चाहती हूं कि मैं खुद भी इस बात को लेकर बेहद सजग रहती हूं कि मैं पंडित रामाश्रय झा जी की, विनय मुद्गल जी की, वसंत ठकार जी की, जितेंद्र अभिषेकी जी की, पंडित कुमार गंधर्व जी की, नैना देवी जी की शिष्या हूं। मैं जब शास्त्रीय संगीत गा रही होती हूं तो उसमें कोई हल्की चीज गाने की कोशिश नहीं करती। मैंने इस बात का हमेशा ध्यान रखा है कि अगर मैं ‘पॉपुलर म्यूजिक’ गा रही हूं तो उसमें जबरदस्ती ‘राग दरबारी’ नहीं थोपती। मैंने कभी भी इस ‘आइडिया’ से ‘पॉपुलर म्यूजिक’ नहीं गाया कि मैं इससे शास्त्रीय संगीत को आम लोगों के बीच लेकर जाऊंगी। मैं ऐसा कोई दावा ना करती थी, ना करती हूं ना करूंगी क्योंकि मुझे लगता है कि मुझसे कहीं ज्यादा सशक्त संगीत है। वो किस तरह से, किसके ह्दय पर, किसके कानों पर कब चढ़कर बोलेगा मुझे नहीं पता। अगर मेरी आवाज से हो जाए तो मैं धन्य हूं। मैं हमेशा ईश्वर को इस बात के लिए धन्यवाद देती हूं कि मेरे जीवन में संगीत का साथ है लेकिन ये कहना कि मैं शास्त्रीय संगीत का प्रचार प्रसार कर रही हूं, मैं कौन हूं ये कहने वाली। मैं खुद को एक ऐसी भाग्यशाली महिला मानती हूं जिसको लोग सुनने आते हैं, जिसे लोग नमस्कार करते हैं क्यों, क्योंकि वो गाना सुना रही है। संगीत से मेरा जीवन समृद्ध हुआ है ना कि मैं संगीत का प्रचार प्रसार कर रही हूं। संगीत के अलावा मुझे तकनीक का बड़ा ही शौक है इसीलिए अनीश और मैंने 2003 में गुरूजी की 75वीं वर्षगांठ पर ‘अंडरस्कोर रिकॉर्ड्स’ शुरू किया। जिसमें भारतीय संगीत के तमाम रूपों, साहित्य, आर्टिकल, सामग्री का वितरण होता है।

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