अब आपको इस राग के शास्त्रीय पक्ष के बारे में बताते हैं। इस राग के नाम को अलग अलग तरीके से पुकारा जाता है। कौशिक कांहड़ा को कौंसी कांहड़ा भी कहा जाता है। इस राग के विस्तार में मालकौंस और भीमपलासी का मिश्रण दिखाई देता है। इस राग के बारे में शास्त्रों में कहा गया है कि जिस तरह ऋषि मुनि भगवान विष्णु के विविध स्वरूपों का वर्णन करने में खुद को असमर्थ पाते हैं वैसे ही इस राग का वर्णन करना जटिल है। ऐसा इसलिए क्योंकि इस राग को विविध स्वरूप वाला राग माना गया है। इसकी वजह ये है कि उत्तर भारत के तमाम घरानों में इस राग को अलग अलग तरीके से गाया बजाया जाता है। जैसा कि लेख की शुरूआत में हमने कहा कि शायद यही वजह है कि ये राग अन्य रागों

के मुकाबले कम प्रचलित है। इस राग को मध्य रात्रि का राग माना गया है। राग कौशिक कांहड़ा के आरोह अवरोह को देख लेते हैं

आरोहनि सा , नि सां  

अवरोहसां नि प म, () S रे (सा) रे सा

मुख्य स्वर समूह नि , () S रे म स रे स

इसी राग में विश्वविख्यात संतूर वादक पंडित शिव कुमार शर्मा और दूसरे नामचीन कलाकार उस्ताद जाकिर हुसैन की जुगलबंदी का वीडियो भी काफी लोकप्रिय है।

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