ये वो दौर था जब हिंदी फिल्म इंडस्ट्री पर केएल सहगल का जादू बोलता था। सिर्फ 42 साल की उम्र में दुनिया छोड़ गए केएल सहगल का फिल्म इंडस्ट्री में करियर ज्यादा बड़ा नहीं था। ये अलग बात है कि अपने छोटे से करियर में उन्होंने प्रभावी अभिनय के साथ साथ कई यादगार नगमें भी फिल्म इंडस्ट्री को दिए। ‘जब दिल ही टूट गया’, ‘गम दिए मुस्तकिल’ जैसे गाने आज भी संगीत प्रेमियों को याद हैं। ये बात हर कोई जानता है कि शोहरत की बुलंदियों को छूने वाले गायक मुकेश शुरू में केएल सहगल की नकल किया करते थे। भारत रत्न से सम्मानित लता मंगेशकर केएल सहगल की गायकी की दीवानी थीं। कहते हैं कि कुंदन लाल सहगल बिना शराब पीए गाना नहीं गाते थे। एक बार नौशाद साहब ने उनसे कहा कि वो बिना पीए ही गाने की कोशिश करें। पहले तो सहगल साहब ने ऐसा करने से सीधा इंकार कर दिया। बाद में जब उन्होंने बिना पीए गाया तब वो अमर गाना रिकॉर्ड हुआ- जब दिल ही टूट गया हम जीकर क्या करेंगे। जब सहगल साहब की अर्थी उठी तो ये गाना भी बजाया गया। उन्होंने अपने मरने से पहले ही ऐसी इच्छा जताई थी। खैर, चलिए एक नए राग की कहानी आपको सुनाते हैं। आपको बताते हैं कि फिल्मी गायकी में तमाम शोहरत हासिल करने वाले केएल सहगल को असल में किस गाने से पहचान मिली थी। वो गाना था- झूलना झुलाओ री। इस गाने की रिकॉर्डिंग 1932 में हुई थी। ये गाना शास्त्रीय राग देवगंधार पर कंपोज किया गया था। इसी दौरान गाए गए गैर फिल्मी गीतों से केएल सहगल को रातों रात पहचान मिली। केएल सहगल उस वक्त 27-28 बरस के थे।

राग देवगंधार की जमीन पर 1950 में आई फिल्म ‘सरगम’ का एक गाना भी कंपोज किया गया था। फिल्म सरगम उस दौर के जाने माने निर्देशक पीएल संतोषी ने राज कपूर को लेकर बनाई थी। आज के दौर के जाने माने फिल्मकार राजकुमार संतोषी पीएल संतोषी के ही बेटे हैं। खैर, फिल्म सरगम के उस गाने के बोल थे-जब दिल को सताए गम। संगीतकार थे सी रामचंद्र और गायिका थीं लता मंगेशकर। लता मंगेशकर और सी रामचंद्र की जोड़ी ने फिल्म इंडस्ट्री को कई यादगार नगमें दिए हैं। खास तौर पर जब संगीतकार सी रामचंद्र दर्दभरे नगमें बनाते थे तो उनके दिमाग में गायक के तौर पर सिर्फ लता मंगेशकर का नाम ही आता था। तमाम फिल्मी गानों के अलावा लता मंगेशकर का गाया अमर गीत ऐ मेरे वतन के लोगों भी सी रामचंद्र ने ही कंपोज किया था। राग देवगंधार गाने बजाने के लिहाज से काफी दुर्लभ राग है. शास्त्रीय मंचों पर भी ये कम ही सुनने को मिलता है. इसलिए इस राग में सुगम से लेकर शास्त्रीय संगीत तक बहुत ही गिनी चुनी रचनाएं हैं. हालांकि सरोद के पर्याय कहे जाने वाले उस्ताद अमजद अली खान की देवगंधार में  एक बड़ी खूबसूरत रिकॉर्डिंग सुनने को मिलती है।

आइए अब आपको राग देवगंधार का शास्त्रीय पक्ष बताते हैं। राग देवगंधार आसावरी थाट का राग माना जाता है। इसमें ‘ध’, ‘नी’ कोमल और दोनों गंधार इस्तेमाल किए जाते हैं। आरोह और अवरोह में सात- सात सुर होने की वजह से इस राग की जाति संपूर्ण होती है। राग देवगंधार में वादी सुर ‘ध’ और संवादी ‘ग’ है। वादी और संवादी शब्द की आसान समझ के लिए हम आपको बताते रहे हैं कि शतरंज के खेल में जो महत्व बादशाह और वजीर का होता है वही महत्व किसी भी शास्त्रीय राग में वादी संवादी सुरों का होता है। राग देवगंधार को गाने बजाने का समय दिन का दूसरा पहर माना गया है। इस राग के बारे में एक और कहानी बहुत प्रचलित है। कहते हैं कि पहले इस राग का नाम द्विगंधार था। ऐसा इसलिए क्योंकि इस राग में दोनों ‘ग’ लगते हैं। बाद में यही द्विगंधार धीरे धीरे देवगंधार हो गया। राग देवगंधार उत्तरार्ध प्रधान राग है। राग देवगंधार राग आसावरी और राग जौनपुरी से मिलता जुलता राग है लेकिन आलाप के आखिर में ‘ग’ का प्रयोग इसे अपने जैसी रागों से अलग करता है। आइए आपको राग देवगंधार का आरोह-अवरोह और पकड़ भी बताते हैं।

 

आरोह- सा रे म प, नी S नी सां

अवरोह- सां नी S , म प S रे सा, रे ग म प रे सा

पकड़- म प S सारे सा, रे ऩी सा रे ग S

 

राग देवगंधार में दरअसल कीर्तन काफी होते हैं। इसीलिए आपको इस राग में एक ऐसे कलाकार की रिकॉर्डिंग आसानी से मिल जाएगी जिनके परिवार में कीर्तन की परंपरा थी। इस कलाकार का जन्म हुआ था गोवा में लेकिन उसने बचपन से ही खुद को शास्त्रीय संगीत को समर्पित कर दिया। वो कलाकार थे- दिग्गज शास्त्रीय गायक पंडित जीतेंद्र अभिषेकी। जिनकी एक और खासियत ये थी कि वो खुद को किसी घराने का कलाकार नहीं मानते थे। आज के दौर के प्रचलित गायक पंडित शौनक अभिषेकी उनके पुत्र हैं। जानी मानी गायिका शुभा मुदगल के तमाम गुरूओं में पंडित जीतेंद्र अभिषेकी भी शामिल हैं।

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