साल 1958 की बात है। मशहूर अभिनेता देव आनंद एक फिल्म बना रहे थे, फिल्म के निर्देशन का जिम्मा राज खोसला पर था। ये फिल्म देव आनंद के अपने बैनर नवकेतन फिल्मस के लिए बन रही थी।

इससे पहले बतौर डायरेक्टर राज खोसला की पिछली फिल्म थी- सीआईडी। जिसमें देव आनंद ने भी अभिनय किया था। जाहिर है दोनों की दोस्ती उसी समय हो गई थी। काला पानी साल 1953 में आए एजे क्रोनिन के उपन्यास ‘बियॉन्ड दिस प्लेस’ पर आधारित थी, जिस पर 1955 में एक बंगाली फिल्म भी बन चुकी थी। देव आनंद ने इस फिल्म के संगीत का जिम्मा सचिन देव बर्मन को सौंपा था। पचास के दौर में सचिन दा और देव आनंद की दोस्ती कायम हो चुकी थी। सचिन दा ने नवकेतन फिल्मस के लिए टैक्सी ड्राइवर जैसी हिट फिल्म का संगीत भी तैयार किया था। इस फिल्म की कहानी एक ऐसे लड़के की थी जिसके पिता को ऐसे कत्ल के आरोप में जेल में बंद कर दिया गया, जो कत्ल उन्होंने किया ही नहीं। उसे बचपन से ही ये बताया गया होता है कि उसके पिता की मौत हो चुकी है, आखिर में वो अपने पिता को बेगुनाह साबित करता है।

खैर, सचिन दा जब इस फिल्म का संगीत बनाने की प्रक्रिया में थे तो एक रोज उनकी मुलाकात पंडित रामनारायण से हुई। पंडित रामनारायण सारंगी बजाया करते थे। उनका संगीत के बड़े खानदानी घराने से ताल्लुक था। उन दिनों वो सारंगी को एक नई पहचान दिलाने की लड़ाई लड़ रहे थे। सचिन दा और पंडित रामनारायण में करीब 20 बरस की उम्र का फर्क था। उम्र के अलावा भी पंडित रामनारायण सचिन दा की बहुत इज्जत करते थे। उन्होंने यूं ही सचिन दा को एक धुन सुनाई। सचिन दा पारखी तो थे ही वो धुन उन्हें तुरंत जंच गई। उन्होंने पहली फुरसत में वो धुन जाने माने गीतकार मजरूह सुल्तानपुरी को सुनवाई। इसके बाद तैयार हुआ वो गाना जो 60 साल बीत जाने के बाद भी कहीं बज रहा हो तो कदम रूक जाते हैं। जिसके बोल थे-हम बेखुदी में तुमको पुकारे चले गए। इन कमाल की लाइनों पर रफी साहब की बेमिसाल गायकी और उस पर से देव आनंद का शानदार भावपूर्ण अभिनय। सचिन दा ने इस गाने में सारंगी का इस्तेमाल किया भी है। इस बात को लोग जानते ही हैं कि सचिन दा को शास्त्रीय संगीत की बहुत अच्छी समझ थी। यही वजह है कि फिल्म के सीन की जरूरत को समझते हुए उन्होंने ये गाया एक बेहद ही खूबसूरत शास्त्रीय राग, राग-छायानट में कंपोज किया था। फिल्म-काला पानी से ‘अच्छा जी मैं हारी’ और ‘नजर लागी राजा तोरे बंगले पर’ जैसे गाने भी लोकप्रिय हुए लेकिन इस गाने की बात ही कुछ और थी। राग छायानट को आधार बनाकर और भी फिल्मी गाने कंपोज किए गए हैं। 1957 में रिलीज फिल्म समुंदर का चैन नहीं आए कहां दिल जाए, 1964 में रिलीज फिल्म- जहांआरा का बात मुद्दत के ये घड़ी आई है और 1969 में रिलीज फिल्म- तलाश का तेरे नैना तलाश करें जिसे बीते दौर के हिट गानों में गिने जाते हैं।

फिल्म तलाश में भी संगीत सचिन देव बर्मन का ही था। राग छायानट पर आधारित फिल्मी गानों को सचिन दा ने और भी कुछ फिल्मों में मन्ना डे से गवाया था। बदलते दौर की फिल्मों में इस राग का इस्तेमाल संगीतकार राजेश रोशन ने किया था। फिल्म का नाम था- पापा कहते हैं। सोनू निगम के गाए उस गाने के बोल थे- मुझसे नाराज हो तो हो जाओ खुद से लेकिन खफा खफा ना रहो। ये गाना अनुपम खेर पर फिल्माया गया था। छायानट पर आधारित गीतों के जरिए आप समझ सकते हैं कि ये राग कितना कर्णप्रिय है। इस राग की खूबी ये है कि जितना ये सुगम संगीत में खिलता है उतना ही खयाल गायकी में भी सुंदर लगता है। छायानट शास्त्रीय गायकी से लेकर वाद्य संगीत तक में बराबर सुनने को मिलता रहता है।

अब आपको राग के शास्त्रीय पक्ष के बारे में बताते हैं। राग छायानट की उत्तपत्ति कल्याण थाट से मानी गई है। इस राग में दोनों ‘म’ का इस्तेमाल किया जाता है। राग छायानट के आरोह और अवरोह दोनों में सात सात स्वर लगते हैं इसलिए इस राग की जाति संपूर्ण संपूर्ण होती है। राग छाया का वादी स्वर ‘रे’ और संवादी स्वर ‘प’ है। इस राग को गाने बजाने का समय रात का पहला प्रहर है। दिलचस्प जानकारी ये है कि इस राग की उत्पत्ति राग छाया और राग नट को मिलाकर हुई थी लेकिन ये राग इतना प्रचलित हो गया कि अब ज्यादातर कलाकार राग छाया या राग नट की बजाए राग छायानट को ही गाते बजाते हैं। जैसा कि हमने शुरू में बताया कि इस राग में तीव्र म का प्रयोग भी होता है लेकिन संगीत के कुछ जानकार तीव्र म का प्रयोग नहीं करते हैं। ऐसे में ये राग कल्याण की बजाए बिलावल थाट का हो जाता है।आइए अब आपको राग छायानट के आरोह अवरोह और पकड़ के बारे में बताते हैं।

आरोहसा, रे ग म प, नी ध सां

अवरोहसां नी ध प, (तीव्र) प ध प, ग म रे सा

पकड़प रे S, रे ग S, ग म S, म प S, ग म रे, सा रे सा

राग छायानट में शास्त्रीय संगीत की दिग्गज कलाकार डॉ. वीना सहस्रबुद्धे की भी एक रिकॉर्डिंग हैं। जिसके बोल हैं- संदेशा पिया से मोरा।

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