पंडित राजन-साजन मिश्रा को लोग जोड़ी के रूप में ही जानते हैं और पहचानते भी हैं। शायद ही कोई हो जो राजन मिश्रा को अलग और साजन मिश्रा तो अलग से संबोधित कर पाए। दोनों नाम एक साथ ही लिए जाते हैं। ये तो सब जानते हैं कि पंडित राजन मिश्रा साजन मिश्रा से 5 साल बड़े हैं लेकिन शायद ये बात बहुत कम लोग जानते हैं कि बचपन में शैतानियां भले ही ये दोनों मिलकर करते हों लेकिन फंसते हमेशा छोटे भाई साजन मिश्रा ही थे। बड़े भाई को फिल्में देखने का शौक था तो छोटे भाई को खाने-पीने की चीज़ों का, ऐसे में जब भी बड़े भईया राजन मिश्रा फिल्म देखकर आते तो आते ही अपने छोटे भाई को फिल्म की कहानी सुनाते वो तो कहानी ही बताते थे लेकिन कहानी बताते बताते दोनों इतना मग्न हो जाते थे  कि फिर छोटे भाई को मां की मार खानी पड़ती ये सारे किस्से बेहद दिलचस्प हैं। भले ही ये दोनों भाई आजतक ना लड़े हों लेकिन बचपन में इनकी शरारतों और पिटाई खाने के किस्से बेहद दिलचस्प हैं।

आप दोनों भाई बचपन में बेहद शरारती थे तो आपके पिता जी घर से निकलने से पहले आपके लिए आपकी मां को क्या हिदायत देकर जाते थे?

मेरी कहानी दरअसल हमारी कहानी है। हमारी जोड़ी को अब अलग अलग नाम से कोई बुलाता भी नहीं है। हम राजन मिश्रा या साजन मिश्रा नहीं रहे, हम राजन-साजन मिश्रा हो चुके हैं। मैं, साजन मिश्रा राजन भैया से 5 साल छोटा हूं। हम दोनों भाईयों की कहानी मैं ही आपको सुनाता हूं। हम दोनों भाईयों का जन्म बनारस में कबीरचौरा  में हुआ था। जहां कलाकारों की एक बस्ती भी है। कबीर का जन्मस्थान यूं तो लोग लहरतारा मानते हैं लेकिन यहीं पर आकर उन्होंने बीजक मंत्र का अविष्कार किया था। हमारे लिए बड़े भाग्य की बात है कि हम लोगों का जन्म उनके घर के बिल्कुल सामने हुआ है। बचपन में हम आम घर के बच्चों की तरह जबरदस्त शरारती थे। गिनने पर याद नहीं आता कि कितनी बार हमारी पिटाई हुई। आम तौर पर होता ये था कि पिता जी किसी कार्यक्रम में जाने से पहले अम्मा को बोलकर जाते थे कि घर लौटने पर उन्हें सच सच बताया जाए कि हम दोनों भाईयों ने उनके जाने के बाद क्या क्या किया। हमारी शरारतें उनके जाने के बाद ही शुरू भी होती थीं।

बचपन में फिर किंगकॉन्ग की वजह से आपकी पिटाई हुई थी जबकि फिल्म को बड़े भाई राजन ने देखी तो फिर पिटाई छोटे भाई साजन की क्यों हुई ये क्या किस्सा है?

बचपन में अपनी पिटाई के कई किस्से मुझे याद हैं। बड़े भैया को फिल्में देखने का बहुत शौक था और मुझे खेलने कूदने का। मेरी बहन जब भी कोलकता से आतीं थीं तो वो राजन भैया को फिल्म दिखाने ले जाती थीं। मैं फिल्म देखने की बजाए अम्मा से पैसे ले लेता था और ऊंटपटांग चीजें खाता था। गोलगप्पे, अमचूर और चीनी। घर के पास ही एक बेकरी थी, उसके यहां के गर्मागर्म बिस्किट। लेकिन भैया जब लौट कर आते थे तो पूरी फिल्म की कहानी सुनाते थे।  एक बार भैया फिल्म किंग कॉन्ग देखकर आए, वो दारा सिंह और किंग कॉन्ग की फिल्म थी। भैया मुझे पूरी नाटकीयता के साथ फिल्म की कहानी सुना रहे थे। हम भी पूरे उत्साह में उनको सुन रहे थे। भैया ने बताया कि किंग कॉन्ग पहले दारा सिंह को 5-6 बार पटकता है, फिर उसके बाद दारा सिंह में शक्ति आती है। फिर वो किंग कॉन्ग को उठाकर सात चक्कर लगाकर फेंकते हैं। हम सब अवाक थे, भैया ने हमारी तरफ देखकर पूछा- देखोगे कि दारा सिंह ने वो कमाल कैसे किया था? मैंने कहा- हां। भैया ने मुझे किंग कॉन्ग बनाकर गद्दे पर पटक दिया। इसी पटकनी में मुझे चोट लग गई और मैं रोने लगा। अम्मा आईं तो भैया ने सारी बात मुझ पर ही थोप दी, मुझे तुरंत दो थप्पड़ पड़े। चोट भी लगी और दो थप्पड़ भी पड़े। ऐसे ही हमारा रामलीला का भी एक किस्सा है।

हमारा अगला सवाल साजन मिश्रा जी से है कि बचपन में ऐसा क्यों होता था कि गलती किसी की भी हो लेकिन मां के थप्पड़ आपको ही खाने को मिलते थे?

बनारस की रामलीला बहुत मशहूर होती थी। उस जमाने में रामलीला देखने के लिए घर से ही दरी वगैरह लेकर जाते थे। एक दिन हम दोनों भाई लंका दहन देखकर लौटे। वहां से लौटने के बाद लंका दहन का सीन मेरे दिमाग में छाया हुआ था। रात भर मैं सपने में लंका और हनुमान जी को देखता रहा। मैं जब सुबह उठा तो मेरा भी मन किया कि मैं हनुमान बनूं। मैंने मुंह में दो छोटे छोटे बॉल डाल लिए, उसके बाद मैंने खुद को शीशे में देखा कि मैं हनुमान जैसा दिख रहा हूं या नहीं। उसके बाद औरतों की नकली चोटी से अपनी पूंछ बनाई। रामलीला से एक गदा हम खरीद कर लाए ही थे। मैंने वो गदा लेकर पूरे कमरे में घूम घूमकर जय श्रीराम, जय श्रीराम करना शुरू कर दिया। फिर दिमाग में आया कि हनुमान जी ने तो लंका दहन किया था, मुझे भी लंका दहन करना चाहिए। पास में ही पूजा का कुछ सामान रखा था, मैंने माचिस से पूंछ को जला लिया। चोटी ने आग पकड़ी तो मुझे भी जलन होने लगी। उसके बाद भी मैं लगातार कूद रहा था। अचानक मेरी पूंछ की आग सामने बुक शेल्फ तक पहुंच गई। किताबें जली तो धुंआ उठा, सामने के घर से बुआ चिल्लाने लगीं कि घर में आग लग गई। तब भी मैं बेखबर गदा लिए जय श्रीराम, जय श्रीराम चिल्ला रहा हूं। बुआ जी की आवाज सुनकर अम्मा आईं तो आग तो बाद में बूझी पहले 5-7 थप्पड़ पड़े। एक और घटना याद आ गई। राजन भैया, शम्मी कपूर की फिल्म देखकर आए ‘जंगली’। हमेशा की तरह उन्होंने घर लौटकर माहौल बनाना शुरू किया-कहने लगे, शम्मी कपूर क्या कमाल का एक्टर है। एकदम अंग्रेजों की तरह गोरा चिट्टा। किस कमाल से वो पहाड़ से कूदता है और कहता है – याहू, चाहे कोई मुझे जंगली कहे। हम सारे बच्चे पूरी तल्लीनता के साथ राजन भैया को सुनने लगे। उसके बाद उस सीन को ‘क्रिएट’ करने की कोशिश भी की गई। राजन भैया ने कहाकि रूको मैं कुछ आइडिया देता हूं। घर के 8-10 बच्चे थे। हम सभी ने मिलकर कमरे में रखे 8-10 फुट लंबे और 6 फुट चौड़े तख्त को दीवार पर टिका दिया। राजन भैया ने कहाकि समझ लो ये पहाड़ है। अब अगला सवाल था कि उसको बर्फीला कैसे बनाया जाए, राजन भैया ने ही आइडिया दिया। वो बोले कि जाओ चुपचाप अम्मा का टैलकम पाउडर उठा लाओ। हम लोग चोरी से पूरा डिब्बा लेकर आए और तख्त पर छिड़काव किया गया। काफी सारा पाउडर तो गिर गया, लेकिन आधे एक घंटे की मेहनत के बाद वो तख्त थोड़ा थोड़ा बर्फीले पहाड़ की ‘फीलिंग’ देने लगा। वहां से सरकना था और बोलना था याहू चाहे कोई मुझे जंगली कहे। सारे बच्चे एक एक करके इस कारनामे का मजा ले रहे थे। दो चार बार तो ये कारनामा सफल रहा, लेकिन एक बार मैं गिरा तो सीधे जाकर दरवाजे से टकराया। मेरे सर से खून निकलने लगा। सभी बच्चे घबरा गए। फिर अम्मा आईं, उन्होंने पूरी बात सुनने के बाद हमेशा की तरह मुझे दो थप्पड़ रसीद दिए। बचपन में हम लोग घर के भंडारे से अनाज चुरा लाते थे। पूड़ी हलुवा जो भी कच्चा पक्का बनता था, वो बनाते थे। वो हमारी पिकनिक होती थी। आज वो बातें याद आती हैं तो लगता है कि हम बचपन में कितने दुष्ट थे, कितने खुराफाती थे।

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