बचपन से ही संगीत सुनते हुए गाना गाते हुए पंडित छन्नूलाल मिश्र एक बार बनारस गए और फिर वो वहीं के होकर रह गए। यहां उन्हें वो सब मिला जिसका सपना शायद बड़े शहरों में रहने वाले कलाकारों को भी नहीं मिलता। बनारस में भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रस्तावक वो कैसे बनें और अमित शाह जी से उनकी पहली मुलाकात कैसे हुई। वो कौन सी आरती थी जिसे सुनकर अमित शाह ने पंडित जी को मिलने के लिए बुलाया और प्रधानमंत्री का प्रस्तावक बनने का प्रस्ताव उनके सामने रखा। रागगिरी से हुई खास मुलाकात में कुछ ऐसी ही बातें के जवाब पंडित छन्नूलाल मिश्र से हमने जानें

आप शास्त्रीय संगीत गायक हैं तो फिर देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रस्तावक आप कैसे बनें और राजनीति से आपका क्या रिश्ता है?

पिछले करीब 2 साल से मेरी एक और पहचान है। वो ये कि मैं इस देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का बनारस में प्रस्तावक भी था। उसका किस्सा भी बड़ा दिलचस्प है। हुआ यूं कि चुनाव के पहले एक रोज बनारस के मेयर साहब मेरे पास आए और कहने लगे कि अमित शाह जी हमसे मिलना चाहते हैं। अमित शाह जी ने हमको बड़े सम्मान के साथ बुलाया, हमको सम्मानित किया और कहने लगे कि हम मोदी जी के प्रस्तावक बने। हमने उनसे कहाकि भगवान कृष्ण कहते हैं कि जो उनको जिस तरह भजता है, वो उसको उसी तरह भजते हैं। अगर आज मोदी जी को हमारी जरूरत है तो हम उनके साथ है। अमित शाह जी ने कहाकि उन्होंने हमारी शंकर जी की आरती सुनी है, जो उनको बहुत अच्छी लगती है। हमने उनसे कहा कि किसी दिन आराम से आइए तबले के साथ सुनाएंगे तो और मजा आएगा। हम किसी पार्टी पॉलिटिक्स से नहीं जुड़े हैं। हम किसी पार्टी के नहीं हैं। हम कलाकार हैं। हम सभी के है, सभी मेरे हैं। इसलिए उन्होंने जब हमसे संपर्क किया तो हमने हामी भर दी। वैसे भी हमारा मानना है कि सभी को मौका मिला है तो मोदी जी को भी मिलना चाहिए। हमको उनका स्वभाव, उनका विचार अच्छा लगता है। हम गुजरात भी गए हैं, हमने देखा कि वहां भी मोदी जी सभी को साथ लेकर चलते हैं। जब हम कचहरी गए तो मोदी जी ने हमारा पैर छुआ, हमको बैठने के लिए कहा वो खुद खड़े रहे। हमको मोदी जी अच्छे लगे तो हमने उनके प्रस्तावक बनने के लिए हामी भर दी थी। बाद में लोगों ने तरह तरह से घुमा घुमाकर हमसे सवाल किए, हमारे नाम के राजनीतिक इस्तेमाल की बात हुई। जबकि हमने बराबर कहाकि हम किसी पार्टी के नहीं है, मोदी जी के अलावा कोई और भी उनसे पहले आता-हमको सम्मान के साथ आग्रह करता तो हम उसका भी साथ देते।

आप स्वच्छ निर्मल गंगा का सपना देख रहे हैं तो क्या इसमें नरेंद्र मोदी जी की ओर से आपको कोई मदद मिली?

अब मोदी जी की सरकार को करीब दो साल हो गए हैं। बनारस को उनसे बहुत उम्मीदें हैं। उनका प्रस्तावक होने के नाते लोग मुझसे भी काफी उम्मीदें रखते हैं। सरकार बनने के बाद भी मोदी जी से मुलाकात का मौका मिला है। एक बार राजघाट पर भी मुलाकात हुई थी। हमने वहां भी गाया। मोदी जी ने सुना। हमने मोदी जी से कहा है कि सबसे पहले वो हमारी गंगा को निर्मल करें। गंगा हमारी माता है। गंगा का नाम लेने भर से लोग तर जाते हैं। उसको साफ करना बहुत जरूरी है। शहर की सफाई पर भी बहुत ध्यान देने की जरूरत है। लेकिन मैं ये भी कहना चाहूंगा कि साफ सुथरा रखने की इच्छा इंसान में अंदर से आती है। हमको तो आज भी अगर कहीं आस पास कहीं गंदगी दिखती है तो हम किसी का इंतजार किए बिना खुद ही सफाई करने में जुट जाते हैं। हमको इस बात का इंतजार नहीं करना चाहिए कि कोई दूसरा आकर सफाई करेगा। अगर गंदगी है तो उसको मिलकर साफ करना होगा। सिर्फ कहने भर से कुछ नहीं होगा। सफाई की सामूहिक जिम्मेदारी लेनी होगी।

संगीत साधना है लेकिन क्या आप आज के शिष्यों को इस साधना के काबिल समझते हैं?

खैर, बनारस के शास्त्रीय संगीत पर वापस लौटते हैं। आज जरूरत है कि शास्त्रीय संगीत सही तरीके से आगे बढ़े। आज कलाकार ये सोचने लगे हैं कि कम समय में कैसे आगे बढ़ा, वो रियाज नहीं करते हैं और चाहते हैं कि बड़े कलाकार हो जाएं। मैं ईमानदारी के साथ बता सकता हूं कि बिना तपस्या के कुछ नहीं होता है। हम लोगों ने बचपन से शास्त्रीय संगीत की तपस्या की है। लोग आजकल ‘सोर्स’ लगाते हैं, कलाकारों को लगता है कि किसी ऐसे आदमी को पकड़ लो जो उन्हें गवा दे, उनसे बजवा दे। लेकिन ऐसे करके कामयाबी एकाध बार ही मिलेगी, एक बार ही तो ऐसे जुगाड़ से आप बड़े मंच तक पहुंच सकते हैं। अब जनता को संगीत की बहुत समझ हो गई है। कलाकारों में तपस्या, त्याग और धैर्य होना चाहिए। अगर धैर्य नहीं है तो संगीत नहीं सीख सकते हैं। आजकल के छात्र संगीत सीखने आते हैं तो सोचते हैं कि कैसे 6 महीने में ही सबकुछ सीख लिया जाए। कैसे रेडियो आर्टिस्ट बन जाएं… कैसे उस्ताद जी आगे निकल जाएं। बड़े ताज्जुब की बात है कि आजकल बच्चे ऐसा भी सोचने लगे हैं। शिष्य को चाहिए कि अपने स्तर को देखते हुए गाना बजाना करें। अपने गुरू का आदर सत्कार करें क्योंकि जो गुरू को नहीं मानता है वो आगे नहीं बढ़ सकता है। जो तपस्या करेगा वही आगे बढ़ेगा, चार दिन में संगीत सीख कर आगे नहीं बढ़ा जा सकता है। हम लोग जो यहां तक पहुंचे, उसके पीछे की लगन मेहनत को समझना होगा। हमको पद्मभूषण मिला। उससे बड़ी बात कि श्रोताओं का इतना प्यार मिला। एक बात जान लीजिए, किसी भी असली कलाकार के लिए सबसे बड़ा सम्मान होता है-श्रोताओं का प्यार। उस मामले में हम बहुत भाग्यशाली हैं वो प्यार मिलता रहे बस।

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