ख्याल गायकी शास्त्रीय संगीत की वो शैली है जो आज भी सबसे ज्यादा प्रचलित है। ख्याल गायकी भारतीय शास्त्रीय संगीत की सबसे पुरानी शैलियों में से एक है। बावजूद इसके आज भी शास्त्रीय गायकी का ये अंदाज सबसे ज्यादा प्रचलित और प्रमुख माना जाता है। ख्याल गायकी में में राग की शुद्धता के साथ साथ भाव पक्ष पर भी पूरा जोर दिया जाता है। कहा जाता है कि इस शैली को खोजने और अपनाने वाले पहले कलाकार हैं हजरत अमीर खुसरो। हजरत अमीर खुसरो का हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत में बेमिसाल योगदान है। ये कहना भी अतिश्योक्ति नहीं होगी कि अगर अमीर खुसरो ना होते तो शायद हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत का मौजूदा स्वरूप भी नहीं होता। ख्याल गायकी के विस्तार की बात करें उससे पहले भारत रत्न से सम्मानित पंडित भीमसेन जोशी का राग भैरवी सुनिए

ऐसा माना जाता है कि ख्याल गायकी का अविष्कार 12वीं शताब्दी में महान संगीतकार और कवि हजरत अमीर खुसरो ने किया था। ये उस दौर की बात है जब अमीर खुसरो गयासुद्दीन बलवन के आश्रम में रहते थे। इतिहास में दर्ज है कि जब गुलाम घराने का अंत हो गया तो अमीर खुसरो खिलजी वंश के नौकर हो गए। अलाउद्दीन खिलजी ने युद्ध में देवगिरी के राजा को हराया था। उस वक्त अमीर खुसरो उनके साथ थे। देवगिरी में एक महान शास्त्रीय विद्वान रहा करते थे गोपाल नायक। अमीर खुसरो चाहते थे कि वो उन्हें अपने साथ दिल्ली ले चलें। खुसरो को लगा कि गोपाल नायक इसके लिए सहजता से तैयार नहीं होंगे इसके लिए उन्होंने एक प्रतियोगिता की, जिसमें छल करके गोपाल नायक को हराया और उसके बाद उन्हें अपने साथ दिल्ली ले आए। अमीर खुसरो ने दक्षिण के शुद्ध स्वरों को प्रचलित किया। नए नए रागों की रचना की। इसके अलावा इन नए नए रागों में गाने के लिए गीतों की रचना की। यही गीत दरअसल आज ‘ख्याल’ के नाम से मशहूर हैं।

हजरत अमीर खुसरो के बाद जौनपुर के सुल्तान मोहम्मद शारूकी और हुसैन शारूकी ने भी 14वीं शताब्दी में इस शैली को खूब बढ़ावा दिया। यहां आपको बताते चलें कि शास्त्रीय रागों में प्रचलित राग जौनपुरी को यहीं की पैदाइश माना जाता है। इसके बाद जिन दो कलाकारों की बात करना बहुत जरूरी है वो हैं अदारंग और सदारंग। ये दोनों ही कलाकार 18वीं शताब्दी में मुगल शासक मोहम्मद शाह रंगीला के दरबारी गायक थे। कहते हैं कि इनके पास ख्याल गायकी की बंदिशों का भंडार था। ख्याल गायकी लोकप्रिय तो हो रही थी लेकिन अब भी आम लोगों तक, संगीत रसिकों तक नहीं पहुंची थी। उसका गाना बजाना राजमहलों में ही चल रहा था। 20वीं शताब्दी की शुरूआत में ख्याल गायकी राजदरबारों से निकलकर मंच तक पहुंची। ग्वालियर, किराना, आगरा, पटियाला और मेवाती घरानों के कलाकारों ने ख्याल गायकी की लोकप्रियता को चार चांद लगा दिए। बड़े गुलाम अली खान ख्याल गायकी सुनाते हैं आपको

ये जानना भी जरूरी है कि ‘ख्याल’ एक फारसी शब्द है जिसका मतलब होता है कल्पना या विचार। ख्याल गायकी के साथ आम तौर पर ये धारणा है कि ये एकल गायन है। हां, कुछ कलाकार ऐसे जरूर हुए हैं जो ख्याल गायकी को जोड़ी में गाते हैं। पद्मभूषण से सम्मानित कलाकार पंडित राजन साजन मिश्र का उदाहरण दिया जा सकता है। बनारस घराने की बड़ी पहचान पंडित राजन साजन मिश्र पिछले पांच दशक से भी ज्यादा समय से साथ गा रहे हैं। आपको बता दें कि ख्याल गायकी के दो मुख्य अंग होते हैं- स्थायी और अंतरा। इसमें राग के विस्तार, श्रृंगार और भक्ति की पूरी संभावना होती है। ख्याल गायकी की लोकप्रियता को कुछ ऐसे भी समझा जा सकता है कि अलग अलग घराने के कलाकार इसे गा तो रहे ही थे धीरे धीरे वाद्ययंत्रों पर ख्याल बजाया जाना भी शुरू हो गया। दिग्गज कलाकार नजाकत-सलामत अली का ये वीडियो देखिए

ख्याल गायकी की खूबियों को भी आपको बताते हैं। इस गायकी में किसी भी राग के स्वरों में आलाप षडज के साथ शुरू किया जाता है। साथ ही ये जानना भी बहुत जरूरी है कि ख्याल गायकी में छोटा ख्याल और बड़ा ख्याल गाया जाता है। बड़े ख्याल में स्थायी का विस्तार विलंबित लय में किया जाता है। ख्याल का विस्तार आलाप, बोल-आलाप, सरगम और तान के साथ किया जाता है। ज्यादातक मौकों पर ये एक ताल, तीन ताल, तिलवाड़ा, झुमरा या रुपक में होता है। बड़े ख्याल को खत्म करते वक्त द्रुत लय में तानों को गाया जाता है। इसके बाद छोटा ख्याल शुरू होता है जो ज्यादातर एक ताल या तीन ताल में होता है। छोटा ख्याल में आलाप, बोल-आलाप के साथ स्थायी और अंतरे पर तान, सरगम और लयकारी का प्रदर्शन किया जाता है। आखिर में स्थायी की तिहाई लेते हुए सम पर गायकी को खत्म किया जाता है।

ब्रज और अवधी में लिखी गई बंदिशें राग के स्वरों में सजकर जब संगीत प्रेमियों के बीच पहुंचती है तो ख्याल गायकी को एक नया विस्तार मिलता है। ज्यादातर बंदिशें प्रेम, गुरू वंदना, भक्ति, श्रृंगार, कृष्णलीला जैसे विषयों को ध्यान में रखकर लिखी गई हैं। जो सदारंग-अदारंग, प्रेमपिया, सनदपिया, सबरंग ने लिखी हैं। ख्याल गायकी का माधुर्य पक्ष यानी इसकी सुंदरता राग, स्वर, ताल, बंदिश और लयकारी में है। इसके विस्तार पक्ष में आलाप, बहलावा, तान, बोलतान और सरगम है। भाव पक्ष में स्वर सौंदर्य, रंजक्ता, प्रकृति, मींड, गमक और खटका का प्रयोग होता है। ख्याल गायकी में संगत के तौर पर तबला, तानपुरा, सुरमंडल, हारमोनियम और सारंगी का इस्तेमाल किया जाता है। ख्याल गायकी में उस्ताद अमीर खान, बड़े गुलाम अली खान, पंडित भीमसेन जोशी, मल्लिकार्जुन मंसूर, पंडित कुमार गंधर्व और पंडित जसराज जैसे कलाकारों का नाम अमर है। मौजूदा पंडित राजन साजन मिश्रा, पंडित अजय चक्रवर्ती, उस्ताद राशिद खान, श्रीमती प्रभा आत्रे जी ख्याल गायकी के बड़े नाम हैं।

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