आप तबला वादक बनना चाहते थे लेकिन आप अच्छे गायक हैं इस प्रतिभा को पहली बार किसने महसूस किया ?

राजकोट की संगीत नाटक अकादेमी में बोरवानी सर मुझे तबला सिखाते थे। एक रोज मैं कुछ गुनगुना रहा था। जो उनके कानों में पड़ गया। उन्होंने तुरंत मुझसे कहा कि- तुम तबला सीखने में अपना ‘टाइम’ क्यों बर्बाद कर रहे हो तुम गाना क्यों नहीं सीखते। मैंने कहाकि मुझे तबला बहुत पसंद है। उन्होंने कहाकि वो मुझे तबला बजाना सिखाते रहेंगे लेकिन मुझे गाना भी सीखना होगा। ये उनकी इच्छा थी। उनसे पहले भी जब मैं करीब 11 साल का था तो मेरी गायकी की बहुत तारीफ हुई थी। राजकोट में नवरात्र का बड़ा महत्व होता है। शारदीय नवरात्र का समय था। एक कार्यक्रम में मुझे गाने का कहा गया। जिन सज्जन ने मुझे गाने को कहा उन्होंने मुझे स्कूल में गाते सुना था। मैं लता जी का गाया अमर गीत ऐ मेरे वतन के लोगों गाया करता था। वो गाना मुझे याद था। उस कार्यक्रम में यही कोई चार पांच हजार लोग बैठे हुए थे। मुझे उनके सामने स्टेज पर बुलाया गया। मैंने पूरे आत्मविश्वास के साथ वो गाना वहां सुनाया। वहां बैठे लोगों को वो गाना बहुत पसंद आय़ा। कई लोग ऐसे थे जो भावुक हो गए।  एक सज्जन तो उठ कर खड़े हुए और उन्होंने ऐलान किया कि वो मुझे 51 रुपये का ईनाम देना चाहते हैं। लेकिन बावजूद इसके गायकी का सिलसिला विधिवत तालीम के साथ शुरू नहीं हुआ।

यहां तक कि 17 साल की उम्र तक मैंने बोरवानी सर की बात नहीं मानी। मैं सिर्फ तबला बजाना ही सीखता रहा। राजकोट की संगीत नाटक अकादेमी से ही गुलाम कादिर खान साहब भी जुड़े हुए थे। बोरवानी सर की इच्छा का भी मुझे ख्याल था। लिहाजा मैंने गुलाम कादिर खान साहब से संगीत की तालीम लेना शुरू किया। इस बीच एक और वाकया हुआ। हमारे घर पर मनहर भाई को उर्दू सिखाने के लिए एक बुजुर्ग आया करते थे। जब वो मनहर भाई को उर्दू सीखाते थे तो मैं भी वहीं बैठा रहता था। ऐसे ही मुझे उर्दू से प्यार हुआ। फिर मैंने उनसे गुजारिश की कि मुझे भी उर्दू सिखाएं। उन दिनों मैं बेगम अख्तर को खूब सुना करता था। इसके बाद जिस कलाकार की गायकी में मैं डूबता चला गया तो फनकार थे मेहंदी हसन साहब। उर्दू जुबां का अच्छा लगना, बेगम अख्तर और मेहंदी हसन साहब की गजलों से मोहब्बत करना ये सबकुछ ऐसे हुआ कि बस दिल ने कहाकि अब मैं भी गजल ही गाऊंगा। लेकिन  राजकोट गुलाम कादिर खान साहब से सीखने का सिलसिला ज्यादा लंबा नहीं चल पाया क्योंकि अगले ही साल जब मैं करीब 18 बरस का था तो मैं बॉम्बे आ गया। मेरे बड़े भाई मनहर उधास मुंबई में ही थे। वो कई सारे गुरुओं से सीखते थे। जिसमें फय्याज खां साहब थे, जिसमें गोविंद प्रसाद जयपुर वाले थे और के महावीर जी थे। इन सभी दिग्गज कलाकारों ने मनहर भाई तालीम हासिल कर रहे थे। मनहर भाई की तालीम जब चल रही होती थी तो मैं वहीं बैठा रहता था। मन ही मन मैं भी ये सीखता रहता था कि वो क्या सीख रहे हैं, कैसे सीख रहे हैं, कौन सा राग सीख रहे हैँ। इस तरह करीब डेढ़ दो साल का वक्त बीत गया। जब मैं करीब बीस साल का था तब मेरी पहचान मास्टर नवरंग नागपुरकर साहब से हुई। मास्टर नवरंग नागपुरकर ग्वालियर घराने से थे और शास्त्रीय संगीत के बड़े गवैये थे। मास्टर नवरंग नागपुरकर की शिष्याओं में आशा भोंसले जी जैसे कलाकार भी शामिल हैं। खैर, एक दिन मास्टर नवरंग नागपुरकर जी ने मुझसे कहाकि- तुम मेरे पास बैठे और सीखो।

मास्टर नवरंग नागपुरकर का सीखाने का अंदाज बहुत अच्छा था। उन्हीं के सामने बैठकर मैंने गाना शुरू किया। उसके बाद जब तक वो जीवित थे मेरा उनका गुरू शिष्य का रिश्ता कायम रहा। बॉम्बे में ही स्टेज पर गाने का सिलसिला भी शुरू हुआ। 1970 के शुरूआती सालों की बात है। हुआ यूं कि मेरे बीच वाले भाई निर्मल उधास ने एक कॉन्सेप्ट तैयार किया था। मनोरंजन ऑरकेस्ट्रा शो की तर्ज पर उन्होंने एक स्टेज शो प्लान किया। उस शो का नाम था- ‘थ्री फेबुलस सिंगर्स’। उस वक्त तक मनहर भाई साहब का फिल्मी गायकी में नाम हो चुका था। उनके गाए गाने हिट हो चुके थे। ‘थ्री फेबुलस सिंगर्स’ शो में हम तीनों भाई स्टेज पर गाया करते थे। उसमें हम एक फीमेल आर्टिस्ट भी रखते थे। जिसमें कई बार हमारे साथ सुलक्षणा पंडित गाया करती थीं। स्टेज पर इस कार्यक्रम की बड़ी धूम होती थी। हम फिल्मी गाने गाया करते थे। मैं उस कार्यक्रम में ज्यादातर मुकेश साहब के गाने गाया करता था। उसमें भी मुकेश साहब का गाया मेरा पसंदीदा गाना था- मुझे तुमसे कुछ भी ना चाहिए, मुझे मेरे हाल पर छोड़ दो। इन कार्यक्रमों से मेरी बाकयदा प्रोफेशनल गायकी शुरू हुई। ये वो दौर था जब फिल्मी संगीत में मोहम्मद रफी, किशोर कुमार, मन्ना डे, हेमंत कुमार जैसे दिग्गज कलाकार गा रहे थे। फिल्मी गायकी के अलावा दूसरा माध्यम शास्त्रीय संगीत था। जिसके श्रोता थे। लेकिन इसके अलावा और कोई माध्यम नहीं था। लिहाजा मैंने खुद को गजल से ही जोड़े रखने का फैसला किया। गजल में मुझे बेपनाह मोहब्बत भी थी। मुश्किल ये थी कि गजल को लेकर कोई ‘विंडो’ नहीं थी। सिर्फ एक कंपनी थी जो कैसेट निकाल सकती थी लेकिन उसके पास पहले से इतना काम था कि नए लोगों के लिए जगह ही नहीं थी। यहीं पर जीवन का संघर्ष समझ आया। कुछ मौकों पर तो बड़ी मायूसी हाथ लगी। ऐसा लगा कि मेरे लिए अब आगे कुछ बचा ही नहीं है। मैं हार गया। सारे रास्ते मेरे लिए बंद हो गए हैं। ऐसे समय में ही मैं कनाडा और अमेरिका चला गया। इन दोनों देशों में लगातार मैंने कई कार्यक्रम किए। ये मेरी किस्मत थी कि मेरे कार्यक्रम वहां लोगों ने बहुत पसंद किए। लोग मुझसे पूछने लगे कि मैं विदेश में क्या कर रहा हूं मुझे तो हिंदुस्तान में होना चाहिए। इसी सवाल का जवाब मुझे वापस अपने वतन ले आया।

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