आपका बचपन लखनऊ में ही बीता और संगीत की शिक्षा की शुरुआत भी वहीं हुई, अपने स्कूल कॉलेज के बारे में कुछ बताइए

मैं अपने जन्म के बाद अगले बीस साल तक लखनऊ में ही रहा। लखनऊ में मेरा जीवन बहुत मजेदार बीता है। वहां एक सहाय सिंह स्कूल हुआ करता था। मेरी पांचवीं तक की पढ़ाई उसी स्कूल में हुई। कुल मिलाकर संगीत के माहौल और इन्हीं छोटी मोटी बदमाशियों के बीच मेरा बचपन बहुत अच्छा बीता।  ये मैं आप लोगों को बता ही चुका हूं कि बचपन में कई परीक्षाएं मैंने टीचरों को गाने सुना सुनाकर ही पास कर लीं। इसके अलावा एक दिलचस्प बात ये भी है कि मैंने सात साल की उम्र से ही स्टेज शो करने शुरू कर दिए थे। इसका एक फायदा ये था कि मुझे उसी उम्र से पैसे मिलने लगे थे। कहीं पांच रूपया, कहीं 10 रूपया और कहीं 30 रुपया मिलता था। उन दिनों ये बड़ी रकम हुआ करती थी। लिहाजा रूपये पैसे के लिहाज से मुझे कोई परेशानी नहीं थी। इसके अलावा मेरे अंदर स्टेज को लेकर कभी कोई डर नहीं था। फिर बारहवीं तक कानपुर कॉलेज में पढ़े और फिर लखनऊ विश्वविद्यालय से बीए किया। बीए में मेरा विषय था- राजनीति शास्त्र, समाजशास्त्र और हिंदी साहित्य। उसी दौरान मैंने लखनऊ के भातखंडे संस्थान से संगीत की विधिवत तालीम ली।

आपने बहुत छोटी उम्र में ही अपना ऑरकेस्ट्रा बनाया था और आप कोरस में भी गाया करते थे तो उस  बारे में दर्शक जरुर जानना चाहेंगे

जब मैं थोड़ा और बड़ा हुआ तो मैंने ‘रॉयल कम्पेनियन’ नाम से एक ऑरकेस्ट्रा बनाया। उस ऑरकेस्ट्रा से हम लोगों ने कई कार्यक्रम किए। उन दिनों स्टेज पर मैं किशोर कुमार के गाने गाता था, गजलें गाता था और भजन भी गाता था। इसके अलावा ग्रेजुएशन की पढाई के बाद मैं मुंबई आ गया। उस वक्त मेरी उम्र बीस साल थी। मुंबई में मैंने ऑल इंडिया रेडियो ‘ज्वाइन’ कर लिया। हमें कोरस में गवाया जाता था। करीब 30 गायकों की टोली थी जो एक साथ गाती थी, मैं भी उसी में से एक था। उस समय हमें महीने के 320 रुपये तनख्वाह मिला करती थी। वहां हमें बहुत कुछ सिखने को मिला। उसी दौरान मैंने मुंबई में छोटे छोटे कार्यक्रम करने शुरू कर दिए। चूंकि स्टेज शो बचपन से करते आ रहे थे, इसलिए उसको लेकर किसी तरह की झिझक नहीं थी। पिता जी के नाम का भी फायदा मिलता था। उनकी वजह से भी छोटे छोटे कार्यक्रम मिलना शुरू हो गए।

आपको पहली फिल्म का ऑफर कैसे मिला था?

इसके बाद करियर के लिहाज से एक रोज बड़ी घटना हुई। अभिनेता मनोज कुमार ने मेरा गाना सुना। उन्हें मेरी आवाज बहुत पसंद आई। उन्होंने सीधा ही ऑफर कर दिया कि तुम मेरी फिल्म में गाओ। उन्होंने फिल्म ‘शिरडी के साई बाबा में मेरा गाना रख दिया। ये फिल्म 70 के दशक के आखिरी सालों  में आई थी। फिल्म के गाने भी हिट हुए और फिल्म तो खैर हिट हुई ही। इससे ये हुआ कि संगीत की दुनिया में लोगों ने मेरा नाम जानना शुरू किया। लोगों को मेरी आवाज मेरा अंदाज पसंद आने लगा और  फिल्मों में मेरी गायकी का सिलसिला शुरू हो गया। जल्दी ही मैंने उस दौर के सभी बड़े संगीतकारों के लिए गाना गाया। कल्याण जी आनंद जी, लक्ष्मीकांत प्यारेलाल जी, ह्रदयनाथ मंगेशकर, आरडी बर्मन साहब, बप्पी दा, आनंद मिलिंद  जैसे उस दौर के सभी बड़े और नामी संगीतकारों के लिए मैंने गाना गया। उन गानों को लोगों ने काफी पसंद भी किया। लेकिन उस पूरी गायकी में मैं कुछ ‘मिस’ कर रहा था। दरअसल मुझे सबसे ज्यादा मजा मंच पर गाने में आता था। लिहाजा मैंने धीरे धीरे फिल्मों में गायकी कम की और मंच पर ज्यादा से ज्यादा कार्यक्रम करने लगा। आज भी मुझे मंच पर गाने में ही सबसे ज्यादा मजा आता है। बाद में गाने के ‘पिक्चराइजेशन’ किए। मैंने कुछ गुजराती, बंगाली और मराठी फिल्मों में काम भी किया। कई फिल्मों में संगीत दिया।

आप भजन सम्राट हैं लेकिन रातोंरात ये चमत्कार कैसे हुआ?

इसके बाद 1980-81 में मेरा एक एल्बम आया। उस एल्बम का नाम था-भजन संध्या। उस वक्त मेरी उम्र 27 साल थी। 27 साल की उम्र में ही मेरा एल्बम घर घर में पहुंच गया। भजन संध्या एल्बम के भजन पूरे देश में गूंजने लगे। पूरे देश में मेरा नाम हो गया। इसकी सबसे बड़ी वजह ये है कि भक्ति संगीत सिर्फ लोगों को मनोरंजन नहीं करता है बल्कि लोगों के ह्दय को आनंद देता है। ये एक किस्म का ‘मेडीटेशन’ है इसीलिए लोग भजन सुनने के बाद उससे चिपक जाते हैं। इसीलिए आज भी मैं भजन का आनंद लेता हूं। हर जगह लोगों को भजन सुनाता हूं। लेकिन सच्चाई ये है कि मुझे आज भी लगता है कि 25-26 साल की उम्र का जो ‘क्रिएशन’ था वो आज तक चला आ रहा है। वही भजन संध्या, वही भजन गंगा, वही भजन यात्रा, वही शाम-ए-गजल…वही सारे एल्बम आज भी भजन और गजल की दुनिया में गूंज रहे हैं। ऐसा मेरे साथ ही नहीं सभी कलाकारों के साथ होता है कि 25-30 साल की उम्र में जो ‘क्रिएशन’ होता है वो बिल्कुल तरोताजा होता है और करियर के लिहाज से काफी काम करता है। मुझे भी उन्हीं दिनों का ‘क्रिएशन’ आज तक शोहरत दे रहा है। भजन संध्या एल्बम में ही भजन था- ऐसी लागी लगन मीरा हो गई मगन। सोचा जाए तो इस एक भजन ने कमाल ही कर दिया। मुझे भजन गायकी में स्वीकार कर लिया गया। मुझे विदेशो से शो मिलने लगे। मैं कभी अमेरिका में गा रहा हूं, कभी अफ्रीका में। हर जगह सिर्फ यही भजन बज रहा है-ऐसी लागी लगन मीरा हो गई मगन। इस भजन ने सभी को अपना दीवाना बना लिया था। 1981 से चल रहा वो सिलसिला अभी भी कायम है। मजे की बात ये है कि आज भी अगर मैं किसी कार्यक्रम में ऐसी लागी लगन भजन ना गाऊं तो आयोजक पैसे नहीं देते हैं। यानि अगर कार्यक्रम के आयोजक से पैसे लेने हैं तो ऐसी लागी लगन गाना ही गाना है।

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