आपने 10 साल की उम्र में पहली बार फिल्म में गाना गाया ये वो दौर था जब आप शास्त्रीय संगीत भी सीख रही थी तो ये मौका आपको उस दौर में कैसे मिली और क्या फिल्म में गाना गाने का असर आपके शास्त्रीय संगीत पर पड़ा ऐसे कई सवाल हैं जिस बारे में गिरजा देवी जी ने रागगिरी से खास बात की। स्वतंत्रता से पहले और बाद में देश में कैसे बदलाव आए और गायन में कब कैसे उन्हें कहां मौका मिला ये सब बातें वो इस एक्सक्यूज़िव इंटरव्यू में बता रही हैं। छोटी उम्र में गाने का शौक और फिर वहां से शुरु हुए सफर से ऐसी सफलता हासिल करना की आज पूरी दुनिया में वो अपनी गायकी की वजह से पहचानी जाती है ये ना सिर्फ उनके लिए बल्कि पूरे भारत के लिए गर्व की बात है।

आपकी शादी छोटी उम्र में हो गयी थी तो क्या शादी के बाद संगीत की संपूर्ण शिक्षा लेना आपके लिए आसान था?

मेरी शादी कम उम्र में ही हो गई थी। 18 साल पूरा करते करते मेरी एक बेटी हो गई। मुझे याद है कि उसी दौरान मेरी तबियत बहुत खराब हुई थी। उसके बाद जब तबियत ठीक हुई तो हमने पंडित श्रीचंद मिश्र जी से गायकी सीखना शुरू किया। उन्होंने मेरी गायकी को संपूर्ण किया। बनारस में चौमुखी गायन होता है। ध्रुपद, धमार, ख्याल, टप्पा, तराना, ठुमरी, होरी, चैती, कजरी जो लोक गीत होता है वो सबकुछ उन्होंने ही हमें सीखाया। हमने अपनी गुरू मां से भी बहुत कुछ सीखा। इसके अलावा बड़े बड़े कलाकारों की गायकी को सुनकर भी सीखने का सौभाग्य मिला। उस दौर में छोटा वाला रिकॉर्डर आता था। तीन मिनट की रिकॉर्डिंग होती थी। हमारे पति का ग्रामोफोन और घड़ी का ही बनारस में बड़ा बिजनेस था। उन्हें मेरे शौक का पता था ही, तो वो भी मेरे लिए नई नई रिकॉर्डिंग ला-लाकर नई नई चीजें हमें सुनाते थे। फिर हमने देखा कि हमारे गांवों में संस्कारी चीजें भी बहुत सारी गाई जाती हैं, शादी के मौके पर, घर में बच्चा होने पर सोहर बन्ना, ये सब भी हमने याद किया। मुझे गायकी का शौक इस कदर था कि जो भी नई चीज मिलती थी हम उसको याद करते थे। उसका रियाज करते थे।

आपने 10 साल की उम्र से ही फिल्मों में गाना गाना शुरु कर दिया था लेकिन वो क्या किस्सा है जिस बारे में आप कहती हैं कि हम दौड़-दौड़कर गाया करते थे?

एक बार बड़ी मजेदार घटना हुई। हमारी उम्र करीब 10 साल रही होगी। हम लोग कलकत्ता घूमने गए थे। पिता जी, मम्मी और हम बहनें। दरअसल कलकत्ता में हमारे मामा रहते थे। हमारे मामा को पहलवानी का शौक था। उनके यहां बहुत सारे पहलवान आते थे। वो लोग फिल्मी दुनिया से भी थोड़ा बहुत जुड़े हुए थे। मामा के एक दोस्त उन दिनों एक फिल्म बना रहे थे। उनको एक ऐसी लड़की की तलाश थी जो अच्छा गा सकती हो और थोड़ी तेज तर्रार हो। एक रोज वो घर आए। हम अपनी कुछ बदमाशी कर रहे होंगे, उनको किसी तरह मेरे बारे में पता चला। उनको ये भी पता चला कि मैं संगीत सीख रही हूं और अच्छा गाती हूं। बस फिर क्या था, उन्होंने मामा के सामने जिद कर दी कि मैं ही उनकी फिल्म में काम करूं। मुझे उनकी फिल्म में काम करने की इजाजत मिल गई। 10 साल की होते होते फिल्म में काम मिल गया। उस जमाने में दौड़ दौड़ के गाना पड़ता था। माइक भी साथ साथ दौड़ता था। आज की तरह उस जमाने में ऐसा नहीं था कि रिकॉर्ड चला दिया और स्क्रीन पर मुंह चला दिया, खुद गाना पड़ता था। हमने भी दिल लगाकर काम किया। हम लोग दिसंबर जनवरी फरवरी वहीं थे, तीन महीने में फिल्म बनी। फिल्म का नाम था- याद रहे।

10 साल उम्र में जब आपने फिल्म में गाया तो उसके बाद आपकी नहीं बल्कि आपकी पिता की आपके गुरु डंडे से पिटाई करने बनारस से कोलकत्ता आ गए थे उस किस्से के बारे में बताइए

ये उस समय की बात है जब गांधी जी ने अछूतों के उद्धार के लिए अभियान चलाया था। उस समय उन लोगों को मंदिर में जाने नहीं दिया जाता था। समाज में बहुत छूआछूत था। उस दौर में वो फिल्म बनी थी। फिल्म के डायरेक्टर थे मूलचंदानी, वो सिंधी थे। फिल्म के संगीत निर्देशक रामपुर के ही एक खान साहेब थे। हमने बहुत समय तक उस फिल्म की फोटो भी संभाल कर रखी हुई थी कि अपने नाती पोतों को दिखाएंगे कि देखो हमने बचपन में क्या क्या किया है। हालांकि हमको इस बात का अंदाजा नहीं था कि हमारे फिल्म में काम करने की खबर जब बनारस पहुंचेगी तो क्या होगा। जैसे ही ये खबर बनारस पहुंची और इसकी जानकारी मेरे गुरू सरजू प्रसाद जी को मिली तो वो डंडा लेकर कोलकाता आए। बाबू जी से मिलकर बोले कि तुमको बहुत मारेंगे,  तुमने बिटिया को फिल्म में दे दिया। अरे राम राम- इतनी अच्छे गले वाली लड़की फिल्मों में काम नहीं करेगी। उन्होंने पिता जी आदेश दिया कि जल्दी से वापस बनारस चलो। वो कलकत्ता से भगाकर वापस हमको बनारस ले आए। इस तरह मेरी जिंदगी का फिल्म से रिश्ता खत्म हो गया लेकिन फिल्म का भी हमें अहसास हो गया था कि कैसे डॉयलॉग बोला जाता है, कैसे बाकी काम होते हैं। हम वापस पूरी तरह संगीत की दुनिया में आ गए। वापस ख्याल, टप्पा और ठुमरी की दुनिया में।

आपने स्वतंत्रता से पहले का समय भी देखा है और आप देश के महान स्वतंत्रता सेनानियों से मिली भी हैं उनसे जुड़ा कोई किस्सा जो आपको अब भी बेहद याद आता हो?

उस फिल्म में काम करने के बाद की घटना है। जबलपुर में कांग्रेस का महाअधिवेशन हुआ था। पंडित मदन मोहन मालवीय के नाम से वहां स्टेशन अब भी है। हम वहां भी गए। वहां महात्मा गांधी जी, पंडित जवाहर लाल नेहरू जी,  सुभाष चंद बोस, अबुल कलाम आजाद,  सरोजनी नायडू जैसी बड़ी बड़ी शस्खियतें आई थीं। हम बड़े बड़े लोगों से मिले, सुभाष चंद बोस से मिले। जवाहर लाल नेहरू से मिले। हमको अब भी याद है कि नेहरू जी ने मुझसे पूछा भी कि तुम गाती भी हो। मैंने भी पूरे जोश में बताया कि हां हां ख्याल गाते हैं, टप्पा गाते हैं। बचपना इतना था कि हम बोलते गए, बोलते गए। उन्होंने खूब प्यार  किया मुझे। उसी समय हम गांधी जी से भी मिले। ऐसा भाग्य कहां होता है। राजेंद्र प्रसाद जी भी थे। एक साथ इतने लोगों से मिलने का। ये सब लोग अछूतों के उद्धार के लिए लोगों को जागरूक करते थे। हम भी इनके साथ में जाते थे। छोटा सा लहंगा और छोटा सा ब्लाउज  पहनकर। उन रैलियों की यादें हमने अब तक संभाल कर रखी थीं।

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