छोटी सी उम्र में ही प्रसिद्धि का ये ऐसा आलम था कि गिरजा देवी जी को उस दौर के बड़े और महान कलाकारों की तरह ही सम्मानित किया जाता है उन्हीं के साथ गाना गाने का मौका मिलता था। सिर्फ इतना ही नहीं अपनी महान गायकी के दम पर इन्होंने देश के राष्ट्रपति से लेकर प्रधानमंत्री तक सभी के सामने परफॉर्म किया और उन सभी से जमकर वाह वाही भी पायी। शादी भले ही छोटी उम्र में हुई हो लेकिन गिरजा देवी जी के जीवन से संगीत कभी नहीं छूटा पहले पिता के घर संगीत सीखने का भरपूर मौका मिला फिर पति के घर भी इन्होंने अच्छे से आगे की संगीत साधना की। कई महान गुरुओं से सीखा और ना सिर्फ उनका बल्कि देश का नाम भी रोशन किया।

आपने छोटी उम्र में ही गायन शुरु किया और आपकी आवाज़ का जादू इतना था कि आपको उस दौर के कलाकारों के बराबरी का दर्जा दिया जाता था तो उस वक्त आप कैसे महसूस करती थी?

हमारे दौर के लोग बड़े व्यवहारकुशल होते थे। दादा दादी बच्चों को समझदारी के किस्से सुनाते थे। मुझे अपना याद है कि पिता जी अक्सर बड़े बड़े कलाकारों के कार्यक्रम में मुझे ले जाते थे। उस्ताद फयाज खान साहब, अलाउद्दीन बाबा का सरोद, बहुत चीज हम सुने। इन्हीं संस्कारों के बीच हमारी जिंदगी अपनी रफ्तार से आगे बढ़ रही थी। मुझे याद है कि 1947-1948 में पहली बार पंडित ओंकार नाथ ठाकुर ने मुझे सुना। इलाहाबाद में रेडियो स्टेशन की ओपनिंग हुई थी। उनको मेरी गायकी इतनी पसंद आई कि उन्होंने 1949 में मेरा पहला कार्यक्रम रखा। उस समय रेडियो के कार्यक्रमों के लिए ऑडिशन नहीं होता था। मेरे गाने पर 90 रुपये का पारिश्रमिक मिला। ये वो रकम थी जो उस वक्त सिद्धेश्वरी देवी, रसूलन बाई जैसे बड़े कलाकारों को मिलती थी। फर्स्ट क्लास का टिकट भी दिया। पांच टिकट का पैसा मिलता था। दो टिकट आने का, दो टिकट जाने का और एक रास्ते के खर्च के लिए। जब लोगों को पता चला कि मुझे 90 रुपये का पारिश्रमिरक मिला है तो लोगों ने कहाकि अरे गिरिजा देवी का तो पहली ही बार में टॉप ग्रेड हो गया। हालांकि उस वक्त ग्रेड तो होता ही नहीं था। लेकिन मोटे तौर पर मतलब ये था कि गिरिजा देवी सबसे ऊपर हो गई। हालांकि सच्चाई ये है कि हमको इस बात से कोई फर्क ही नहीं पड़ता था कि टॉप है, फर्स्ट है या सेकंड है। बस रिकॉर्डिंग के लिए गए और गाना गाकर चले आए।

आपने सबसे पहले आपका सबसे मशहूर गाना “बाबुल मोरा नैहर छूटो जाए” कहां गाया था?

इसके बाद 1951 में हम आरा कॉन्फ्रेंस में गए। दिसंबर का महीना था। वहां पर भी लोगों ने बहुत सराहा। हुआ यूं कि वहां पंडित ओंकार नाथ ठाकुर जी को गाना था, लेकिन उनकी गाड़ी सासाराम में खराब हो गई। वो आ नहीं पाए। उस कार्यक्रम के आयोजक लल्लन बाबू भी हमारे गुरू जी के ही शागिर्द थे। दोपहर में 2 बजे के करीब कार्यक्रम शुरू होना था और सुबह करीब 10-11 बजे उनको पता चला कि ओंकार नाथ ठाकुर जी नहीं आ पाएंगे। ओंकार नाथ जी की जगह पर और कोई गाने को तैयार नहीं हुआ तो उन लोगों ने मुझे ही बिठा दिया। हमारा कार्यक्रम दोपहर एक बजे शुरू हुआ और करीब ढ़ाई बजे खत्म हुआ। हमने राग देसी गाया और उसी दिन गाया “बाबुल मोरा नैहर छूटो ही जाए”। वो कार्यक्रम बड़े पंडाल में हो रहा था, हमने आंख मूंदी और गाना शुरू कर दिया। इस बात की फिक्र किए बिना कि सामने सौ लोग हैं या हजार लोग। बाद में आंख खोली तो देखा कि पंडाल में करीब दो ढाई हजार लोग आए हुए थे। वैसे वो लोग आए थे पंडित ओंकार नाथ ठाकुर जी को सुनने के लिए।

आपको सबसे पहले राष्ट्रपित और प्रधानमंत्री से लेकर सभी देश के बड़े महान नेताओं के सामने गाना गाने का पहला मौका कैसे मिली और क्या आप उस वक्त नर्वस थी?

फिर 1952 में बनारस कॉन्फ्रेंस था, जनवरी में। हमारे पति भी आयोजकों में थे, उसमें हमें भी गाने का मौका मिला। संयोगवश उसी दिन रविशंकर, अली अकबर भैया, विलायत खान साहेब, सब लोग गाने बजाने आए थे। जब हमारा गाना रविशंकर जी ने सुना तो उन्होंने निर्मला जोशी और सुमित्रा जी को कहा कि इनको दिल्ली बुलाइए गाने के लिए। फिर हम 1952 में ही दिल्ली के कॉस्टीट्यूशन क्लब में आए। वहां उन दिनों दो तरह के कार्यक्रम होते थे। एक कार्यक्रम होता था एक घंटे का, वो सिर्फ राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और बाकी मंत्रियों के लिए होता था। उसमें आम जनता नहीं आती थी। उस प्रोग्राम में 20 मिनट बिसमिल्लाह खान साहेब, 20 मिनट डीबी पलुष्कर और 20 मिनट हमको गाना था। उस दिन राष्ट्रपति तो नहीं आए लेकिन उप राष्ट्रपति राधाकृष्णन जी आए थे और भी बड़ी बड़ी हस्तियां आई थीं। सरोजनी नायडू भी थीं। हम किसी को पहचानते नहीं थे। सबका नाम सुन रखा था। कार्यक्रम से पहले हम रवि भैया से पूछे कि भैया हम क्या गाएंगे वहां? रवि भैया ने कहाकि तुम डरो मत एक टप्पा गा दो और एक ठुमरी गा दो, जो कोई नहीं गाता है। हमने एक टप्पा गाया और एक ठुमरी गाई। हमारा गाना सुनने के बाद डॉक्टर राधाकृष्णन जी ने कहा कि इसको कहो कि एक ठुमरी और गाए। हमने कहाकि नहीं हम नहीं गाएंगे, क्योंकि हम समय से ज्यादा गाएंगे तो ये लोग बीच में उठ जाएंगे और फिर हमको रोना आएगा। हमको पता नहीं था कि हम जो बोल रहे हैं वो माइक की वजह से सभी को सुनाई दे जाएगा। फिर डॉक्टर साहब ने इशारा किया कि नहीं नहीं हम बैठे हैं, हम नहीं जाएंगे। उसके बाद हमने एक ठुमरी 40 मिनट तक गाई। वो ठुमरी खमाज की थी। उसके बोल अभी तक याद हैं मुझे, “मोहे कल ना पड़त छिन राधा प्यारी बिना”। उसके बोल बनाते चले गए और सामने बैठे लोग सिर हिलाते रहे। उस समय हम देख देख कर गाते थे, आंख बंद नहीं करते थे। गाते गाते घड़ी का पता तक नहीं चला, इसके बाद तो प्रेस वाले सब लोगों ने जमकर तारीफ की। पेपर में पापा का, गुरू का, सबका नाम छपा। धीरे धीरे मेरी गायकी का शोर होने लगा। जीवन की असली चुनौती तब आई जब मेरे पति इस दुनिया से चले गए। हम बहुत अकेले हो गए। हमने अपनी बेटी की शादी कलकत्ता में की थी, बाद में हम भी वही चले गए संगीत रिसर्च एकेडमी में। लेकिन आज भी बनारस मेरा घर है। मेरा सारा काम बनारस से ही होता है। हां, कलकत्ता भी मेरे घर की तरह ही है सच कहूं तो पूरा हिंदुस्तान मेरा घर है।

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