साल 1995-96 की बात होगी. इलाहाबाद के प्रयाग संगीत समिति में शास्त्रीय गायन का कार्यक्रम चल रहा था. सर्दियों का मौसम था. रात के करीब 10 बज गए तो आगे बैठकर सुन रहे शहर के जाने-माने संगीत रसिक राजीव दवे जी उठकर चलने को हुए. गायक ने मंच से कहा- दवे जी आपके लिए एक शेर पेश करता हूं-

उधर तुम हो कि जाने को खड़े हो,

इधर दिल है कि बैठा जा रहा है

दवे जी झेंपकर दोबारा बैठ गए और फिर पूरा गायन खत्म होने के बाद ही उठे.

मंच पर थे हरदिलअज़ीज शास्त्रीय गायक पंडित छन्नूलाल मिश्रा. छन्नूलाल मिश्रा की तबीयत ऐसी ही है. मौज में गाते हैं, मज़े लेकर गाते हैं और जब गाने लगते हैं तो फिर समय नहीं देखते. पंडित छन्नूलाल मिश्रा को जो एक बार सुन ले वो उन्हें कभी भूल नहीं सकता क्योंकि छन्नूलाल जी का अंदाज सबसे जुदा है. सुननेवालों के साथ लगातार संवाद करना, गाने के प्रकार, उसे गाने का तरीका, बोलों के प्रसंग और उनके मायने बताते चलना छन्नूलाल जी की खासियत है. छन्नूलाल मिश्रा गाते-गाते कब बोलने लगते है और बोलते-बोलते कब गीत के बोलों को पकड़कर सम पर आ जाते हैं पता ही नहीं चलता. यही वजह से कि सुननेवाला लगातार उनके जादू में बंधा रहता है.

पंडित छन्नूलाल मिश्रा कहते हैं- ‘गाना अगर सुननेवाले को समझ में न आए तो गाना बेकार है.’ इसलिए वो गाते-गाते गीत की तमाम बारीकियां समझाते चलते हैं. ठुमरी गाएंगे तो बताते चलेंगे कि खटका क्या होता है, मुर्की कैसे लगाते हैं, गिडकिरी किसे कहते हैं और पुकार कैसे लगाते हैं. पंजाब अंग की ठुमरी का क्या अंदाज है, गया में कैसे गाते हैं और बनारस की ठुमरी में बोल कैसे कहते हैं.

संगीत, साहित्य और संवाद छन्नूलाल मिश्रा की सबसे बड़ी खासियत है. छन्नूलाल जी मानते हैं कि साहित्य के बिना संगीत अधूरा है. अपनी प्रस्तुतियों में वो गीत के साहित्य को रेखांकित करते चलते हैं. एक-एक शब्द का मतलब और उसके इस्तेमाल की वजह समझाते चलते हैं. ‘खेलें मसाने में होरी दिगंबर’ गाते हुए जब वो भोलेशंकर और उनके गणों की होली का चित्रण करते हैं तो सुननेवाले जैसे किसी और ही लोक में पहुंच जाते हैं.

वहीं जब वो राधिका की होली गाते हैं तो श्रृंगार रस की अद्धुत छटा दिखाई देती है

छन्नूलाल मिश्रा संपूर्ण संगीतकार हैं. खयाल, ध्रुपद, धमार, तराना, ठुमरी, भजन, होरी, चैती, कजरी, सोहर, झूला…आप नाम लीजिए और पंडित जी शुरू हो जाएंगे. अपने ठेठ बनारसी लहज़े में छन्नूलाल जी कहते हैं- ‘गायक को पसारी का दोकान होना चाहिए, ये नहीं कि क्लासिकल गाते हैं तो क्लासिकलै गाते हैं, जो चाहिए सब मिलेगा. ‘

छन्नूलाल मिश्रा सुरों को बरतने में एक से बढ़कर एक कमाल दिखाते चलते हैं लेकिन साहित्य कभी पीछे नहीं छूटता. वो कहते हैं ‘ स्वर भगवान का रूप है, इसलिए आनंद आना जरूरी है

राग तब तक ही गावैं जब तक अनुराग हो राग से, राग से बैराग होने लगे तो राग बंद कर देना चाहिए..उसके बाद भी बहुत चीजें हैं गाने को- कजरी, चैती, होरी, सोहर..’

छन्नूलाल मिश्रा आजमगढ़ जिले के हरिहरपुर में 3 अगस्त 1936 को पैदा हुए. उनके दादा पंडित सामता प्रसाद जाने-माने तबला वादक थे जिन्हें गुदई महाराज के नाम से जाना जाता है. छन्नूलाल के पिता पंडित बद्री प्रसाद मिश्रा ने संगीत की शुरुआत कराई. पांच साल की उम्र से ही पिता सुबह-सुबह उठाकर रियाज कराते थे. इसके बाद वो छन्नूलाल को बिहार के मुजफ्फरपुर ले गए और किराना घराने के उस्ताद अब्दुल गनी खां का शागिर्द बनाया. छन्नूलाल जी ने उनसे नौ साल लगातार शास्त्रीय संगीत की तालीम ली. इनके अलावा पद्मभूषण ठाकुर जयदेव सिंह से गुरु शिष्य परंपरा से छन्नूलाल मिश्रा को गाना सिखाया.

छन्नूलाल मिश्रा बताते हैं कि चंपानगर के राजा कुमार श्यामानंद ने पिता को ऑफर दिया था कि इस लड़के को मैं राजगायक बनाऊंगा, आप यहां छोड़ दीजिए लेकिन पिता ने जवाब दिया मैं बेटे के बिना रह नहीं पाऊंगा.  उसके बाद करीब 40 साल की उम्र में छन्नूलाल बनारस चले आए और फिर बनारस के होकर रह गए. वो खुद कहते हैं- मेरी जन्मभूमि हरिहरपुर है, कर्मभूमि बनारस है. तकनीकी तौर पर छन्नूलाल मिश्र का घराना किराना है, लेकिन आज वो पूरब अंग की गायकी का दूसरा नाम बन चुके हैं.

छन्नूलाल मिश्रा शख्सियत भी पूरी तरह बनारस के रंग में रंगी है. हिंदू धर्म ग्रंथों का उन्होने जबर्दस्त अध्ययन किया है. संस्कृत के श्लोक, मानस के दोहे और चौपाइयां उनकी प्रस्तुतियों का अनिवार्य हिस्सा होते हैं. संगीत के जरिए उन्होने धर्मग्रंथों के संदेशों को लोगों तक पहुंचाने कि कोशिश की है. उन्होने सुंदरकांड को भी रागों में कंपोज़ करके रिकॉर्ड किया है. मिसाल के तौर पर ये विभीषण गीता- जिसमें श्रीराम विभीषण को उपदेश दे रहे हैं

पंडित छन्नूलाल मिश्रा को शास्त्रीय संगीत के साथ लोक और पारंपरिक संगीत में महारथ हासिल है. उनके संगीत में पंजाब, पूरब और गया अंग की गायकी का सुरीला मेल है. उन्हें पद्मश्री और संगीत नाटक अकादमी जैसे सम्मान मिल चुके हैं. लेकिन आज भी वो अपनी सादगी के लिए जाने जाते हैं.

प्रकाश झा ने अपनी फिल्म आरक्षण में छन्नूलाल जी से एक गाना गवाया था- सांस अलबेली. साथ में थीं श्रेया घोषाल. मुलाहिज़ा हो-

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